Sunday, August 7, 2016

लेख ....अब गुडियाएँ पीटी नहीं जायेंगीं

सावन आया, गर्मी से मन को राहत मिली तो त्यौहारों की भी झड़ी लग गई तीज, नागपंचमी, रक्षाबंधन, जन्माष्टमी l सब का मन पेंग लगाते झूले की तरह झूलने लगा l एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को प्रथायें सौंपते हम आगे बढ़ते रहे और मनाते रहे एक परम्परा की तरह l भूल गए की आखिर ये त्यौहार होते हैं तो क्यों ? ये प्रथायें हैं तो क्यों ?

नागपंचमी का त्यौहार पूरे उत्तर प्रदेश में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है l आँगन में पान के पत्ते पर चना, कच्चे दूध, पूड़ी के प्रसाद के साथ नाग देवता का पूजन होता है l पकवान बनते हैं l पीले कपड़ों से गुड़ियायें बनतीं हैं उन्हें दिन भर झूला झुलाया जाता है फिर शाम को उन गुड़ियों को चौराहों पर डालने जाते हैं जिन्हें लड़कों द्वारा हंटर और छड़ियों से पीटा जाता है और वो खुश होते हैं l छड़ियाँ विशेष रूप से बनी हुईं बाज़ार में मिलतीं है l मेले लगते है l  इस परम्परा की शुरूआत के बारे में एक कथा प्रचलित है।

तक्षक नाग के काटने से राजा परीक्षित की मौत हो गई थी। समय बीतने पर तक्षक की चौथी पीढ़ी की कन्या राजा परीक्षित की चौथी पीढ़ी में ब्याही गई। उस कन्या ने ससुराल में एक महिला को यह रहस्य बताकर उससे इस बारे में किसी को भी नहीं बताने के लिए कहा लेकिन उस महिला ने दूसरी महिला को यह बात बता दी और उसने भी उससे यह राज किसी से नहीं बताने के लिए कहा। लेकिन धीरे-धीरे यह बात पूरे नगर में फैल गई।

तक्षक के तत्कालीन राजा ने इस रहस्य को उजागर करने पर नगर की सभी लड़कियों को चौराहे पर इकट्ठा करके कोड़ों से पिटवा कर मरवा दिया। वह इस बात से क्रुद्ध हो गया था कि औरतों के पेट में कोई बात नहीं पचती है। तभी से नागपंचमी में गुड़िया पीटने की परंपरा है l                                                                                                                         
जब कि हम सब जानते है यह रहस्य तो कभी रहा ही नही कि परीक्षित की मृत्यु तक्षक के दंश से हुई| परीक्षित पुत्र जनमेजय ने नाग यज्ञ ही इसीलिए किया था जिसमे कुछ बड़े छोड़ सारे नाग मारे गये थे| अगर रहस्य था भी तो राजपरिवार की महिलाओ और नगर वासिनियो की यह सजा समाज मे कैसे प्रश्रय पाती रही प्रथा बन जाने तक..ये बर्बरता का विषय है उत्सव का नही,.....l यानि उस घटना के बाद भी ऐसी घटनाएं की जाती रहीं  होंगी तभी ये प्रथा बनी l

मैंने उत्तरप्रदेश के अनेक बुज़ुर्गों से जिनके यहाँ ये त्यौहार होता था उनसे भी गुड़िया पीटने की प्रथा का कारण जानने चाहा पर किसी को भी इसका कारण नहीं पता था जब की सबके यहाँ ये त्यौहार इसी तरह से धूमधाम और गुड़िया पीटने के साथ मनाया जाता है l इससे ये सिद्ध होता है हम हर परम्परा बस ढोते जाते हैं बस बिना जाने बूझे, एक पीढ़ी से दूसरी पीढी तक l आज बदले परिवेश में सावन की मस्ती हो , नाग पूजा हो, महादेव पूजन हो पर गुडिया पीटने की प्रथा का अन्त अवश्य होना चाहिए l चाहे वो धीरे धीरे प्रतीक रूप में होने लगें फिर भी ऐसी ही प्रथाएं समाज के एक वर्ग के प्रति असम्मान को प्रश्रय देतीं हैं जो दिन पर दिन वो मन पर विकृत प्रभाव डालतीं हैं और दुसरे को नीचा मान उनके उनके मान और प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचातीं हैं 
......आदर्शिनी श्रीवास्तव ......

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