Wednesday, January 18, 2017

कहानी ......महा वसीयत

सुबह सात बजे का समय था l सबके घर सूचना पहुँचाई जा रही थी l सबके मुँह से आश्चर्यमिश्रित आह निकलती l कुछ को बोलने को कुछ समझ न आता और वो मौन रह दर्द में डूबी सूचना सुन लेते, कोई कर्णिक को सान्त्वना देते, कोई कहता ओह ये कैसे हो गया ?” कोई कहता मैं अभी निकलता हूँ तुम अकेला महसूस मत करनाl”

        सुहासी लेटी हुई मुस्करा रही थी मुख पर सफ़ेद चादर  डाले और जहाँ-जहाँ फोन से सूचित किया जा रहा था वहाँ-वहाँ वो स्वयं अपनी कल्पनाशक्ति से पहुँच वहाँ की स्थितियाँ देख रही थी l यही तो वो करती आई थी अबतक, लोग जहाँ पहुँचने में हजारों खर्च करके पहुँचते और समय भी गँवाते वहाँ वो अपनी कल्पनाशीकता से मिनटों में पहुँच जाती किसी भी  विषय पर कविता या कहानी लिखनी हो वहाँ की स्थिति देखती उस स्थिति में खुद को डुबोती कभी हँसती कभी मुस्कराती कभी आँखें भी छलकाती .........फिर उस समय वो स्वयं जहाँ दिखती थी वहाँ होती कहाँ थी ? जो लोगों को दिखता था वो होता था मात्र देंह l मन तो कभी कोसों दूर होता कभी आस पास ही कहीं विचरता l  ......अपने सूक्ष्म तत्व से वो उस स्थान पर होती जहाँ जिस आधार पर कविता जन्म लेती l फिर जो सज सँवर कर रचना  सामने आती तो लोग वो पढ़कर भावविभोर हो जाते l............ आज भी यही हुआ वो हर घर में होने वाले तमाशे को देख रही थी l कोई कह रहा था अभी बॉडी घर नहीं पहुँची होगी जल्दी-जल्दी कुछ बना लो पूरा दिन भूखा कैसे रहेंगे इतनी दूर सफ़र भी करना है l कोई कह रहा था अच्छा हुआ आज जल्दी ही सब्जी रोटी बना ली थी l कोई कह रहा था इतने सालों से दवा चल रही थी पर बहुत हिम्मती थी सुहासी l किसी ने कहा हम तो जा रहे है पर आज से तवा, कड़ाही नहीं चढ़ना है पर तवा उल्टा करके या अल्युमिनियम की प्लेट में रोटी बना लेना l ऐसे ही समय में वो काम आती है इसीलिए उसे फेंकते नहीं l आज कल पूड़ी पराठा कौन खा पाता है बरखी के खाने तक ?और बाप रे बिना  खाए तो रहा ही नहीं जाता गैस बनने लगती है l कोई कहता दवा खाना है कुछ तो  खाना ही पड़ेगा l यहाँ लाश कहाँ है कुछ खा ले l सब जैसे जनम के  भूखे थे l ......... लोग घर सुव्यवस्थित कर, हल्का सिंगार कर, भूख न होने पर भी जबरदस्ती ठूँसठास कुछ घंटों का उपचार कर निकलने की तेयारी कर रहे थे l कोई नेट पर ए  सी का टिकट देख रहा था कोई जनरल का , कोई बस से ही आने की सोच रहा था l कुछ के पास असमय ही अत्यंत व्यस्तता आन पड़ी थी l वो शुद्धि तक पहुँचने का वादा कर रहा था l कुछ ऐसे भी थे जो सचमुच दुखी थे l गला रुंधा रुंधा था बस काम निपटा रहे थे किसी के प्रश्नों का जवाब देने की सामर्थ्य नहीं थी बस डबडबाई आँखों से कुछ कुछ करते बीच बीच में गालों को पोछ लेते l वो ऐसे थे जिन्हें ऐसी स्थिति में देख कर सुहासी खुश नही थी वो भी दुखी हो गई

      तभी सुहासी गर्मी के मौसम में ठण्ड से कंपकपाने लगी, “अरे यार कितनी ठंडी जगह लिटा दिया वो भी बॉक्स में वो मुस्करा दी, लापरवाही से बोली जाने दो अब कौन सा बीमार पड़ना है l” ..... पर सही है l उस बर्फ की सिल्ली से तो अच्छा ही है l गीला गीला तो नहीं l ........पर उसका भी अपना आनंद होता होगा जैसे समुद्र के किनारे पैर के नीचे से रेत खिसकती है उसी तरह धीरे-धीरे बर्फ पिघलती होगी  शरीर अन्दर धंसता होगा l उसे बचपन में सोते-सोते बहनों का चादर खींचना भी याद आ गया l ..... उसने खुद ही कहा .......वाह री सुहासी तू मरते दम तक कल्पना  कर रही है l लगता है जनम जनम कवयित्री या लेखिका ही बनना है तुझे l अपनी सारी सोच विचार पर उसके मुँह पर स्मित हास था l

अचानक हँसता चेहरा उदास हो गया l सारी मस्ती काफूर हो गई l इस स्थिति में भी उसका दम मानों फिर घुटने लगा l उसे बहुत याद आने लगी प्राधा की, पुन्जिका की और मनस की l कैसे होंगे वो तीनो ? पर मुझे वहाँ जाकर उन्हें देखने हिम्मत नहीं l बस सोचने लगी प्राधा मेरी तरह है वो एकान्त में तडपेगी, सबके बीच न आँसू गिराएगी, न उसे देखकर किसी को लगेगा की उसे विशेष कष्ट है लोग उसे हृदयहीन समझेंगे लेकिन मुझे पता है वो मुझसे सबसे ज्यादा जुड़ी है उसका कोई काम मेरे विचार को जाने बिना होता ही नहीं l और पुन्जिका ? उसने तो जब से सुना होगा रो-रो के बुरा हाल होगा वो बचपन से ही ऐसी थी रोनी, पिनपीनी l बड़े होने तक ठुन्ठुनाती पीछे लगी रहती थी l अपने चाचा की शादी में भीड़ देख क्या रोते ही बीता था समय उसका l मेरा आँचल पकड़े साथ साथ घूमती और मैं उसे डाँटते डपटते दुलराते काम करती जाती l और मनस ..... उसने एक चुप्पी साध ली होगी l जाने क्या-क्या समेटे है अन्दर ? उसका मन का हाल कुछ पता ही नहीं चलता ? पच्चीस साल का होने को है अभी तक उसकी माँ सुहासी ही उसे नहीं समझी तो किसी और का क्या कहें ? मौन तो मौन l उससे ऐसे समय में जो-जो कहा जाता रहेगा वो यंत्रचालित की तरह करता रहेगा l उसके आँसू किसी को दिखेंगे नहीं पर वो रोयेगा l खुद मैंने उसके आँसू कभी नहीं देखे पर ऐसा नहीं कि वो सदा सुख से ही पला है बहुत झंझावात झेले हैं उसने भी हम सबके साथ l वह बुदबुदाई तीन बच्चे तीन नमूना l ...............ये बोलते समय दिमाग की नस कुछ ढीली पड़ी l पर मातृत्व और वात्सल्य से जड़ शरीर में भी जैसे छाती फटने लगी l लगा उठे और उन तीनो को जकड़ दहाड़ मारकर रोये l आखिर अपने बच्चों को कैसे छोडूँ l वो कराह उठी ..., कितना मजबूर हो जाता है इंसान देखता है, सोचता, समझता है, पर अभिव्यक्त नहीं कर सकता कुछ कह नहीं सकता, हिल नहीं सकता l काश मरने के बाद तुरंत चेतना भी शून्य हो जाया करती l

        और कर्णिक भी तो .........l पर अभी उन्हें फुर्सत नहीं मिली है अभी अस्पताल निपटा रहे हैं फोन कर रहे हैं और रिसीव भी कर रहे हैं और अभी शायद ऐसा ही रहेगा एक महीना अभी उन्हें फुर्सत नहीं मिलेगी फोन से l रात में थोडा सोचेंगे पर सोते भी बहुत जल्दी हैं l लेटे नहीं की सोये l उतना याद नहीं करेंगे जितना सबसे चर्चा करेंगे l घर में अगर एक मक्खी ने भी हलचल कर दी तो फिर मोहल्ला, दोस्त, ससुराल, भाई बंधू सबको पता न चल जाए तबतक चैन कहाँ ? फोन पर फोन l इधर फोन उधर फोन l इसीलिए घर में सब बात उनको सबसे देर में पता चलती या बताई जाती कि उन्हें बताया नहीं की हल्ला दुनियाँ जहान में l उसे आज भी खीज लगने लगी और कह दिया आप अपनी बात सबको बताया कीजिये मेरी नहीं और मुस्करा कर एक आँख दबा दी l

      अरे! कुछ लोग आने लगे हैं देखें क्या कह रहे हैं ?......... सबके एक ही सवाल से शुरुआत ये कैसे हुआ ? तबियत खराब थी क्या ? ( जबकि पता था कि तबियत खराब थी ) कर्णिक मुँह लटकाए सुन्न बैठे रटा रटाया सा  सबको जवाब देते l आखिर कोई एक ही सवाल का अलग अलग जवाब कहाँ से लाये l कोई पूछता कब तक ले जाने को कहा है डॉ ने ? (सच पूछो तो उन्हें खुद घर जाने की जल्दी थी कौन भला इस मनहूस माहौल में रहे l अपने क्या सबके गम कम हैं ) हाँ ले तो जाना है बस पुन्जिका का इंतज़ार कर रहे हैं वही दूर से आ रही है फ्लाईट पहुँच गई है बस आती ही होगी और कुछ हॉस्पिटल की फॉर्मलटीज़ भी पूरी करनी है l प्रश्न हुआ पर पुन्जिका का इंतज़ार यहाँ क्या करना जरूरी है ? सुहासी खीजी अरे भैया तुम्हे जाना हो जाओ सबको अपना काम करने दो l

हमेशा से हम और बच्चों में इतना विश्वास रहा कि कभी चोरी से किसी ने एक दुसरे की व्यक्तिगत चीजें नहीं पढ़ीं l अगर कोई ख़त आ जाता तो वो तबतक बंद रखा रहता जबतक उस ख़त का स्वामी न आ जाये l इसीलिए सुहासी ने अपनी वसीहत का राज़ सिर्फ अपने बच्चों को बताया था l एक पन्ना प्राधा को लिफाफे में बंद करके दिया था और उससे कहा था इसे जब हम मर जायेंगे तब ही खोलना l सुहासी ने जीवन की नश्वरता और मृत्यु अवश्य संभावी है इसके विषय में कहनियों के जरिये बचपन में बताया था l अपने बच्चों को उसने कहानियों और लोरियों के जरिये सतसंस्कार दिए थे l सुहासी ने ये भी कहा कि जब हम अस्पताल में रहें तभी इसे डैडी और डॉ अंकल के सामने खोलना l इसमें लिखी बात अभी से कहने से बेकार रोका-टोकी होगी l   प्राधा को इतनी कठोर बात अच्छी नहीं लगी थी पर उसने उसे ले लिया था l

प्राधा अपने पति के साथ पहुँच चुकी थी मनस भी था पुन्जिका पहुँची ही थी l कर्णिक ने कहा - हाँ प्राधा बेटा अब खोलो लिफाफा डॉ अंकल भी हैं ऐसा क्या है इसमें जो अस्पताल में ही पढना जरुरी है l धीरा प्राधा की अन्दर तक घुटी घुटी साँस बाँध तोड़ उफन पड़ी l औरो ने उसे सम्हाला l उसने भी स्वयं को हमेशा की तरह संयत कियाl
उसने रुक रुक कर पढना शुरू किया .....लिखा था .....l

 मेरी वसीयत ......

कर्णिक सबकी आखरी इच्छा का मान रखना तो होता ही हैं मेरी वसीहत का अन्य पन्ना तो घर में है लेकिन एक पन्ना प्राधा के पास सुरक्षित था l आप इसका मान रखेंगे हमें ऐसी उम्मीद है आगे लिखा था-----
मैंने पहले ही अस्पताल आ अपनी बॉडी के पार्ट्स डोनेट करने के लिए फार्म भर दिया था l अगर आपसे बताती तो आप कभी न मानते l मेरी दोनों आँखे किसी नेत्रहीन की आँखों को रौशनी देंगीं, मेरा गुर्दा किसी को दस बीस साल की ज़िन्दगी दे सकता हैं l मेरा ह्रदय किसी और शरीर में धड़कता रहेगा l फिर बताइए हम मरे कहाँ ? हम यहीं रहेंगे आप लोगों के बीच l हर इंसान में मेरा अंश देख आप सबसे प्यार कर सकेंगें l फिर उसके बाद क्या बचेगा सिर्फ हड्डी और खाल ? .........मैंने अब तक की जिंदगी में अनेक मौतें देखीं हैं .......हाँ, महसूस किया है मैंने अन्य के शव को जलते हुए लोगों के भावों को,............. लोग मनाते है जल्दी से जले तो कुछ खाएं और घर जाए और अपने को महान अनुभव करें की हम किसी की मिटटी में गए थे l कुछ लोग तो इतनी देर में समोसा भी छुपकर खाने लगते हैं l अतः मेरी इच्छा है की यहीं शवदाह गृह में मेरी अंतेष्टि हो जाए और जब राख प्रवाहित करने का दिन हो उस दिन ब्रह्मभोज और नाते रिश्तेदारों को नहीं बल्कि किसी अंनाथआश्रम या भूखे लोगों या गरीब लोगों को भोजन कराया या अन्नदान किया जाए l रोइयेगा नहीं चरण स्पर्श l बच्चों को प्यार l
कर्णिक, प्राधा, पुन्जिका, मनस और कुछ और आत्मन अपने आँसू न रोक पाए l कई लोगों के मुँह से प्यार से निकला –“पागली हैं लड़की लेकिन और उपस्थित लोगों की आँखों में अलग अलग भाव थे l दुःख की बेला में भी कुछ गर्वित थे, कुछ हर्षित कुछ का ह्रदय प्यार से छलछला आया था और कुछ के भीतर भाव थे बड़ी नौटंकीबाज हैं l
.......आदर्शिनी श्रीवास्तव ......
१/८१ फेज़-१ , श्रद्धापुरी
कंकड़खेड़ा मेरठ
९४१०८८७७९४




Monday, December 19, 2016

गंगा स्तुति


हे बुद्धिदा भागीरथी तुम ज्ञानदा तेजोमयी
निर्मल सरल सुरसरि सहज तुम प्राणदा आभामयी
किसमें भला सामर्थ्य थी जो वेग अविरल धारता
बस शम्भु शंकर ईश ही समर्थ थे गंगे अहो

गौरांगिनी गंगा पतित पावन कुमारी सुंदरी               
मैनावती-हिमगिरि सुता शोभावती तुम जलपरी
होता प्रखर मति वो मनुज जो नित्य जल सेवन करे
है आस्था विशवास तुम पर जाह्नवी गंगे अहो

सरिता सलिल कल-कल कलिल धुन गुंजरित करुणामयी
उतरी भयंकर वेग से अति शुभ्र हो शुचितामयी
देवर्षि गण वसु यक्ष नग अभिभूत से देखें तुम्हे
नभ से हुई मकरंद वर्षा अक्षरी गंगे अहो

उद्धारिणी हर मानवों की पाप से हो तारती
ढलती हुई गोमुख शिखर से केहरी हो सोहती
वर्षों भगीरथ ने तपस्या की तभी दर्शन हुआ  
धरती हुई तब अम्बुमय, भावान्जली गंगे अहो

हिमकर सरीखी स्वच्छ निर्मल श्वेत नीर तरंगिनी
औषधि तुम्हारे वारि में हे सुरधुनी हे मधुवनी
अतुलित तुम्हारी श्रेष्ठता है कुछ कहा ना जा सके  
शत-शत नमन आभार हो, हे सुर नदी गंगे अहो
... आदर्शिनी श्रीवास्तव ....




Friday, December 2, 2016

सूर्य स्तुति .....उनके २८ नामों के साथ

संसार में जितनी भी प्रकाशवान वस्तु अथवा पदार्थ हैं उसमे प्रकाश सूर्य से ही संभव है l पञ्च महाभूतों में अन्य चार महाभूत सूर्य के आश्रय के बिना संभव नहीं l

हो सूर्यतुम अर्यमानतुम त्वष्टातुम्ही सवितातुम्ही
तुम ही तपे हो स्वर्ण से हो अग्नि की गुरुता तुम्ही
तुम ही जगत की साधना निस दिन तुम्हारा गान है
इस विश्व का आलोक तुम रत्नों की तुममे खान है

हो भानुतुम कामदतुम्ही दिनमणि’ ‘दिवाकरहो तुम्ही
रविकर-निकरउद्भट तुम्ही दिवनाथ’ ‘गहवरहो तुम्ही
भूलोक का कण-कण सदा दिनमानका पूजन करे
गंधर्व ऋषि कंदर्प मुनि शरकांतका अर्चन करें

हो पुत्रवत्सल श्रेष्ठ बुद्धि सद्भाव धैर्य की खान हो
दो दृष्टि का उजियार हो ब्रह्माण्ड का अभिमान हो
अतिशय चमकते तेज से ही चक्र विष्णू का बना
है सत्य सात्विक तेज तप का आचरण तुमसे जना

आदित्यतुम कुंतीपतीअभिमान हो धुलते तुम्ही
मार्तण्ड’ ‘रवि’ ‘दिनकरतुम्ही आपत्तियाँ हरते तुम्ही
करता सुबह जो प्रार्थना पाता अमित वरदान है
संसार की हर वस्तु ज्योतिर्मय तुम्ही से, ज्ञान है

हो अर्कतुम विवस्वानतुम अधिपति’ ‘प्रभाकरहो तुम्ही
हो शीत का उपचार तुम विधु मखमली भी हो तुम्ही
हो अंशुपति’ ‘वह्निनाथतुम धातातुम्ही पूषातुम्ही
दिग्नाथ’ ‘पावकनाथहो तुम प्राणदा ऊषा तुम्ही

              आता प्रलय जब-जब धरा पर नीर किरणें सोखतीं
रचता नया संसार तब नव नव प्रजाती बोलती
हो भास्करकी प्रार्थना तन मन मनस अरु भाव से
तो तेज तुम सा त्याग तुम सा मान ध्यान प्रभाव से 



 ....adarshini srivastva ....


Saturday, November 26, 2016

हम जाने हम कौन

ख़बर आई है कि दाल में नमक कम होने के कारण उसे देंह मुक्त कर दिया गया और उद्धारक को इसमें कोई अफ़सोस नहीं l एक पुराने घर में तमाम मानव बच्चों के कंकाल ढेर लगा और फ्रीज़र में लोथड़े रख लोग मदोन्मत्त हो ज़श्न में डूबे हैं l कहीं कुछ नरों को तेज़ाब से गल-गल के टपकते मांस की महक बहुत सोंधी लग रही है l पूरा एक समूह किसी एक पर हावी हो अपना पुरुषत्व सबित करने को अमादा है l कुछ नरों ने जाल बिछाया है जिसमे एक आतिशबाजी से उछाले गए रंगीन पन्नों की तरह कुछ लोग हवा में लहरा लहरा जमीन पर आ रहे हैं l क्या इंद्रधनुषी छटा है l उन नरों में कुछ पुरुष भी यदा कदा दिख जाते है l पर नरों में बहुत उथल-पुथल है वो अच्चम्भित हैं कि मैंने तो सारे नरों को पुरुषत्व के चोले से अच्छी तरह रंग दिया था और असली पुरुष को उसी असीम सत्ता को अपने पास रखने को तैयार कर लिया था फिर ये कैसे बाहर आ गये ?

कभी-कभी लगता है नर को पुरुष नाम से संबोधित करना भी स्वयं नर की सोची-समझी साजिश है स्वयं को श्रेष्ठ साबित करने के लिए l जिससे वह देवत्व पद पर बड़ी आसानी से आसीन हो सके l उन्हें परमेश्वर कहा जा सके l जब एक परमेश्वर हो गया तो अन्य पदार्थ, जीव  स्वतः नगण्य, भक्त, साधारण, अति साधारण हो गए l फिर जैसा चाहो वैसा उपयोग करो, उपभोग करो , क्या चिंता ? हर नियम कानून, घर, परिवार, समाज, अधिकार में उसका स्थान ऊपर रहे l वैसे शुरू-शुरू में इतनी भीषण समस्या नहीं रही होगी बस यूँ ही मजाक मजाक में नाम रूपांतरण हो गया होगा l पर दिन बीतते ये साधारण बात न रह गई l इसमें से गरल टपका जो बूँद पर बूँद पड़ने से ऊँचा और ठोस होता गया और उस ठोस पदार्थ का नाम हो गया अहंकार l और नर उसे अपना मान सदैव साथ लिए लिए फिरने लगा l नर खद ही भूल गया कि मेरा नाम रूपांतरित है वास्तव में हम पुरुष नहीं नर हैं l जो पुरातन पुरुष से बिलकुल भिन्न है .....और अहंकार तत्व उसमे सर्वथा वर्जित है इसलिए वो पुरुष है l  

दूसरी ओर ---- परिवर्तन रूप क्रिया होना प्रकृति का स्वाभाव है l हाँ प्रकृति परिवर्तनशील है l वह नश्वर है वह स्वीकारती है l वह जब से अस्तित्व में आई पल-पल, हर क्षण बदल रही है l स्वीकार कर रही है l वो ऋतुओं में ढलती है l ओस की बूँद अभी दिखती है कुछ देर बाद नष्ट हो जाती है l वो कली अभी बंद थी अभी खिला फूल हो गई l हरियाली धरा बंजर हो जाती है l लहलहाती धरती भौगोलिक उथल-पुथल से रेगिस्थान में तब्दील जाती है l गाँव का गाँव जल प्रवाह में विलीन हो जाता है l वो कभी प्रियतम के लिए संजीवनी है तो कभी दावानल l कभी कोमल चन्दन का लेप तो कभी कैकटस l उसमे परिवर्तन होता है वो स्वीकारती है उसे नष्ट होना है वो स्वीकारती है इसलिए उसे अहंकार नहीं l उसने किसी और नाम का चोला नहीं ओढा उसने किसी और पुण्य नाम का लबादा नहीं ओढा l उसे अपनी शाश्वश्ता का अहंकार नहीं l अपने नश्वरता पर खेद भी नहीं l 

किन्तु नर अपनी शाश्वत सत्ता के लोभ में खुद को भूल बैठा है और शाश्वत नाम पुरुष का चोला ओढ़ रखा है l वह सोचना नहीं चाहता की वो, वो नहीं जो खुद को समझ रहा है l वो भी प्रकृति की तरह चित्रकार का मात्र एक संकल्प भर है जो कभी भी ढह सकता है l 

नहीं समझे मैं क्या कह रही हूँ ? ......

आओ मैं बताती हूँ पुरुष क्या है ? .... पुरुष वो चेतन सत्ता है जो सर्वथा अपरिवर्तनशील है......, नित्य है,...... अचल है,...... निर्विकार है......, वो कर्म रहित है......., एक रस है......., क्रिया करने की योग्यता उसी मे होती है  जिसमे परिवर्तन और विकार होता है...... पुरुष में परिवर्तन का स्वाभाव नहीं,..... जो अहंकार से मोहित नहीं होता वही तत्त्ववित् है....... वही तत्वदर्शी है ..... निरंकार है ......ओंकार है और .........वही पुरुष है l

......आदर्शिनी श्रीवास्तव ..... 

Tuesday, October 11, 2016

दशहरा ख़ास

हाँ ये सच है कि आज के समय में रावण का पुतला फूँकना एक नाटक ही है क्योंकि रावण अब गली-गली चौराहे चौराहे घूम रहे हैं l लेकिन कुछ लोग दशहरे में रावण का महिमा मण्डन भी कर रहे हैं और कुछ आगामी दिनों में करेंगे l जैसा प्रति वर्ष होता है  l माना रावण संस्कृत और वेदों का ज्ञाता था शिव जी का परम भक्त था l कामधेनु,अर्क प्रकाश और शिव संहिता जैसी कई पुस्तकों का रचयिता भी था  किन्तु अपनी शक्ति पर घमंड करने वालेऔर चरित्रहीन व्यक्ति का ऐसा अंत होना था जो हुआ l वर्षों तक समाज थू थू कर रहा है l.......... इसीलिए कहा गया है धन आया गया तो कोई बात नहीं लेकिन चरित्र गया तो सब कुछ गया l .........जब पाप का घड़ा भरता है तो उदर का अमृत भी काम नहीं आता l

राज्य विस्तार की हवस में धरती स्वर्ग पाताल एक करने वाले रावण के लिए मार्ग में आने वाली स्त्रियाँउसकी युद्ध की थकन और कामना को शान्त करने का साधन मात्र थीं l राज्य विजय कर लौटने पर मार्ग के अनेकानेक नरेशों, ऋषियों, देवताओं, दानवों की कन्याओं का अपहरण कर लेता और वो विलाप करतीं रह जातीं युद्ध में कोई अपना बेटा खोता कोई पति कोई भाई कोई अपना सखा लेकिन रावण को इससे कोई मतलब न था l वो अपने बहनोई का हत्यारा भी था l जिस गलती को उसने स्वीकार किया था l ...... और तो और अपने बड़े भाई कुबेर के पुत्र नलकूबर की प्रेयसी रम्भा को उसकी इच्छा के विरुद्ध अनुचित संपर्क किया जो नलकूबर से मिलने जा रही थी उसकी ये स्थिति देख नलकूबर ने रावण को शाप दिया l...... रावण के डर से लुकती छिपती पितामह ब्रह्मा के भवन की ओर जाती हुई पुन्जिक्स्थला के  साथ दुराचार किया जिससे ब्रह्मा जी द्वारा रावण शापित हुआ l ........ महापार्श्व द्वारा सीता के साथ जबरदस्ती करने के लिए उकसाने पर रावण ने स्वयं ये स्वीकार किया की वो शाप ग्रस्त है और ऐसा करने पर उसका मस्तक खंड-खंड हो जायेगा l ...... रावण ने ब्रह्मर्षि कन्या वेदवती को भी तिरस्कृत किया l वेदवती ने रावण द्वारा स्पर्श किये गए बालों तोड़ कर रावण को शाप दिया और स्वयं अग्नि में प्रवेश कर गईं l इसी वेदवती का दूसरे जन्म में माता सीता के रूप में पृथ्वी पर अवतरण हुआ l

यही नहीं रावण डींग मारने वाला औरअसत्यवादी भी था l उसने भरी सभा में कहा की सीता ने एक वर्ष का समय माँगा है और कहा है यदि एक वर्ष तक दशरथ नंदन नहीं आये तो मैं तुम्हे स्वीकार लूँगी l जबकि बाल्मीकि रामायण के सुन्दर कांड के २२वें सर्ग में लिखा है की रावण ने सीता जी को दो माह की अवधि दी थी जिसपर सीता जी ने उसे बहुत फटकारा था और वो दुष्कर राक्षसियों के पास उन्हें छोड़ अपना सा मुँह लेकर चला गया l यहाँ तक कि सीता जी ने लंका का अन्न तक ग्रहण नहीं किया l इंद्र जी के अनुरोध करने पर उनकी दी हुई अमृत खीर ग्रहण की और उतने दिन क्षुधा मुक्त रहीं l

Friday, October 7, 2016

मौसम और प्रकृति ... बियाहू

                                     
पाहुन आज हुआ मौसम 
वसुधा मन को भाई है
धड़कने ताल देती हैं बँसुरिया गुनगुनाई है

विहँस उट्ठी धरा पर 
मखमली पराग का अंचल
भ्रमर के मन में ललकन 
तितलियों के पंख हैं चंचल
प्रकृति की अधमुँदी पलकों में मदिरा छलछलाई है

बंदनवार घन के झूलते 
अम्बर दुअरिया पर
सितारे जड़ रहे कुंदन 
रूपसी की चुनरिया पर
गगन में आतिशें छूटी दिशाएँ झिलमिलाई हैं 

मंत्रित जल फुहारों की 
डोली नभ से आई है
भरी जब माँग जुगनू ने 
पुलक उर ने मचाई है 
मुख को ढाँप करतल से दुल्हनिया मुस्कराई है 

अतिशे =आकाश के प्रकाश तत्व 
भ्रमर = दूल्हा ( मौसम )





Friday, September 30, 2016

तुझपे दिल कुर्बान

अबकी  केरल  भाषण में  मोदी  जी  का  सख्त  लहजा , तेवर  और  गंभीर  मुख मण्डल  ही  बता  रहा  था  कि उनके  मन  ने  जरुर  कुछ  कर  गुजरने  की  ठान ली  है  l 

" हमारे अट्ठारह जवानों की शहादत बेकार नहीं जायेगी "

"पकिस्तान की आवाम देखो ......... देखो पहले कौन अपने देश की गरीबी और बेरोज़गारी ख़त्म करता है l "

सच ही मोदी जी कहा था " भारत प्रगतिशील देश है वो सॉफ्टवेयर निर्यात करता है जबकि पकिस्तान सत्तर साल से वहीँ अटका  है और बस आतंकवाद निर्यात करता है l "

उन्होंने पकिस्तान की आवाम से पकिस्तान के अत्यचारी नेताओं के खिलाफ आवाज़ उठाने का आह्वान किया l ,,,,,,
पकिस्तान बार-बार हमारे अंदरूनी मामलों में टाँग अड़ाता आया है चाहे वो जे एन यू हो या कश्मीर l अब मोदी जी ने पकिस्तान की जनता तक अपनी बात पहुँचाई है l जब पानी सर से ऊपर चला जाए तो ......जैसे को तैसा .......शठ को शठता ही समझ में आती है l  

गुप्त मंत्रणा कर रक्षामंत्री मनोहर परिकर, अजीत डोवाल जी , ले.ज.रणवीर सिंह जी, मोदी जी और सभी सैनिकों को, ४२ आतंकवादियों और दो सैनिकों को मार गिराए जाने के सफल अभियान की बधाई l  

हमारे  जवानो का तीन  किमी तक  रेंगते  हुए जाना अपना पराक्रम दिखाना और जिस उद्देश्य  और  लक्ष्य के साथ वो गए थे उसे पूरा कर सुरक्षित वापस लौट आना l उनके हौसले ,जज्बे , हिम्मत की मिसाल है l २८ सितम्बर के अँधियारे का   फ़ायदा उठाते  हुए लगभग ४० आतंकवादियों और  २ सैनिकों को मार उनके हथियारों को बर्बाद कर चार घंटे में ही आपरेशन पूरा कर अपने स्थान पर वापस आजाना समस्त भारतवासियों के मन में आत्मविश्वास जगा गया l कल बेचारे पकिस्तान का दिन ही खराब था हाकी में भी भारत के हाथों पिटा और सरहद पर भी l भारत ने पूरे ठसके के साथ ये स्वीकार किया कि हाँ मैंने सीमा पार की  और आतंकी ठिकानों को नष्ट किया यही नहीं उसने पहले ही लगभग ३० देशों को ये सूचना दे दी थी और उन्होंने इस बात का कोई विरोध नहीं किया इससे ज़ाहिर होता है की उनका मौन समर्थन मोदी जी के निर्णय के साथ था क्योंकि सभी देश ,पाकिस्तान एक आतंकी अड्डों का देश है इसे स्वीकार करते हैं l क्योंकि वे भी या तो इस आग में जल रहे है या जलता हुआ देख रहे है और देशों को l सार्क सम्मलेन में भारत सहित चार देशों का बहिष्कार भी पकिस्तान को अलग थलग देश घोषित कर रहा है l भारत भी यही चाहता है की युद्ध न हो बस  पकिस्तान की ताकत इतनी क्षीण हो जाए की वो आतंकी गतिविधियों से तौबा कर ले क्योंकि युद्ध का दुष्प्रभाव पीढ़ियों तक  देशों को शारीरिक, मानसिक और आर्थिक तौर पर अपंग कर देता है l जब जब भारत का कोई नेता पकिस्तान गया या पाकिस्तान से कोई नेता दोस्ती करने के उद्देश्य से भारत आया तब-तब भारत में बम धमाका सुनने को मिला l इससे ये भी ज़ाहिर होता है कि पकिस्तान सरकार का वहाँ की सेना या आतंकियों पर कोई बस नहीं l आतंकी वहाँ छुट्टा घूमा भी करते है और सरकार कुछ नहीं कर पाती जबकि वो भी लाल मस्जिद और पेशावर जैसे दर्द झेल चुकी है l


पकिस्तान भला pok में २८ को हुए हमले से आहत हो भी क्यों ? वो असमर्थ बेबस खुद आतंक पैदा तो करता है दुसरे देशों के लिए ,किन्तु उससे ख़तम करने या सामना करने की ताकत नहीं रखता इसलिए व खुद जर्जर और मजबूर है वो अगर चाहता भी है कि  आतंक ख़त्म हो तो उसके पास इतनी ताकत ही नहीं है की वो उसे ख़त्म कर सके l अमेरिका द्वारा लादेन को मारा जाना और भारत द्वारा इतने आतंकियों का मारा जाना उसके लिए उपहार ही है l जो काम उसे करना चाहिए था उसे दुसरे देश कर रहे हैं l हम अपने घर के कीडेमकोडों के लिए कुछ न करे और बाहर के लोग आकर कीटनाशक से कीड़े नष्ट कर जाए तो हमें क्या दिक्कत  भला ? इसमें दूसरे देश का पैसा दूसरे देश की मेहनत  दूसरे देश की ही सैन्य क्षमता लगती है l तो आतंकवादी भी ये समझ ले की पकिस्तान भी उनका नहीं है जिसके दमपर वो कूदता फिर  रहा है जिसदिन कोई ढंग की सरकार पकिस्तान में आई वो सही साठ ढूँढ उसका खत्म कर देगी l

फिर भी नमुराद पकिस्तान ये मानने को तैयार नहीं की pok में ये हमला हुआ है क्यों माने भला तब तो उसे स्वीकारना होगा की पकिस्तान में आतंकवादी है या फिर ये स्वीकार करे की उसके ४० जवान मारे गए l वो अपने ही झूठ में फँस गया है एक तरफ कहता है हमला हुआ ही नहीं और ये विडियोस और फ़ोटोज़ भारत ने अपने ही देश में बनाई है जब की भारतीय जवानो के हेलमेट में कैमरे फिट थे जिसमे पकिस्तान को पुख्ता सुबूत  दिया जा सके क्योंकि वो बहुत पल्टउऊआ देश है l और दूसरी ओर वो इस घटना की निंदा भी करता है और दो सैनिकों का मरना स्वीकार भी करता है l ये कैसा दोहरापन है उसका l

अब सोचने का विषय ये है कि हमारे १८,१९ सैनिक शहीद हुए थे और हमने ४० आतंकवादी मारे हैं तो क्या इतने बदले से संतुष्ट हो जाना चाहिए ? क्या एक सैनिक की कीमत दो आतंकवादी है ? सैनिकों का परिवार होता है ,भावनाएं होती हैं , देशभक्ति का जज़्बा होने के कारण परोपकार का भाव होता है वो अच्छे घर के अच्छे संस्कारों में पले बढ़े होते हैं उनकी संताने अपने पिता पर गर्व करती हैं उनका नाम छिपाती नहीं  और घर ही क्या पूरा गाँव पूरा शहर पूरा देश उनपर गर्व करता है l एक सैनिक और आतंकवादी की क्या बराबरी ? आतंकवादी की तो लाश भी उसके घर वाले और पाकिस्तानी  सरकार लेने से मना कर देती है l कहीं से भी बच्चे चुराकर बचपन से उनमे घृणा का भाव भर उसे आतंकवादी बनाया जाता है l

सर्जिकल स्ट्राइक की घटना पर हमें मोदी जी के निर्णय और सैनिकों को बधाई देकर खुश होना चाहिए पर अभी और बहुत कुछ करना है  पाकिस्तानी सरकार की नीतियों को बदलने को विवश करना है क्योकि विवश करना ही उसके लिए ठीक शब्द है समझ में तो उसे आता नही l आतंकवादियों  को छेदते हुए उनकी आड़ में काम करने वाली सेना तक पहुँचना है l वहाँ की सेना से बैर इसलिए क्योंकि वो आतंकवादियों की आड़ में अपना काम करती है l वर्ना  किसी देश की सेना से हमारा कोई द्वेष नहीं सब खुश रहे अपनी सीमा में रहे l मैत्री भाव से रहें l