Friday, September 30, 2016

तुझपे दिल कुर्बान

अबकी  केरल  भाषण में  मोदी  जी  का  सख्त  लहजा , तेवर  और  गंभीर  मुख मण्डल  ही  बता  रहा  था  कि उनके  मन  ने  जरुर  कुछ  कर  गुजरने  की  ठान ली  है  l 

" हमारे अट्ठारह जवानों की शहादत बेकार नहीं जायेगी "

"पकिस्तान की आवाम देखो ......... देखो पहले कौन अपने देश की गरीबी और बेरोज़गारी ख़त्म करता है l "

सच ही मोदी जी कहा था " भारत प्रगतिशील देश है वो सॉफ्टवेयर निर्यात करता है जबकि पकिस्तान सत्तर साल से वहीँ अटका  है और बस आतंकवाद निर्यात करता है l "

उन्होंने पकिस्तान की आवाम से पकिस्तान के अत्यचारी नेताओं के खिलाफ आवाज़ उठाने का आह्वान किया l ,,,,,,
पकिस्तान बार-बार हमारे अंदरूनी मामलों में टाँग अड़ाता आया है चाहे वो जे एन यू हो या कश्मीर l अब मोदी जी ने पकिस्तान की जनता तक अपनी बात पहुँचाई है l जब पानी सर से ऊपर चला जाए तो ......जैसे को तैसा .......शठ को शठता ही समझ में आती है l  

गुप्त मंत्रणा कर रक्षामंत्री मनोहर परिकर, अजीत डोवाल जी , ले.ज.रणवीर सिंह जी, मोदी जी और सभी सैनिकों को, ४२ आतंकवादियों और दो सैनिकों को मार गिराए जाने के सफल अभियान की बधाई l  

हमारे  जवानो का तीन  किमी तक  रेंगते  हुए जाना अपना पराक्रम दिखाना और जिस उद्देश्य  और  लक्ष्य के साथ वो गए थे उसे पूरा कर सुरक्षित वापस लौट आना l उनके हौसले ,जज्बे , हिम्मत की मिसाल है l २८ सितम्बर के अँधियारे का   फ़ायदा उठाते  हुए लगभग ४० आतंकवादियों और  २ सैनिकों को मार उनके हथियारों को बर्बाद कर चार घंटे में ही आपरेशन पूरा कर अपने स्थान पर वापस आजाना समस्त भारतवासियों के मन में आत्मविश्वास जगा गया l कल बेचारे पकिस्तान का दिन ही खराब था हाकी में भी भारत के हाथों पिटा और सरहद पर भी l भारत ने पूरे ठसके के साथ ये स्वीकार किया कि हाँ मैंने सीमा पार की  और आतंकी ठिकानों को नष्ट किया यही नहीं उसने पहले ही लगभग ३० देशों को ये सूचना दे दी थी और उन्होंने इस बात का कोई विरोध नहीं किया इससे ज़ाहिर होता है की उनका मौन समर्थन मोदी जी के निर्णय के साथ था क्योंकि सभी देश ,पाकिस्तान एक आतंकी अड्डों का देश है इसे स्वीकार करते हैं l क्योंकि वे भी या तो इस आग में जल रहे है या जलता हुआ देख रहे है और देशों को l सार्क सम्मलेन में भारत सहित चार देशों का बहिष्कार भी पकिस्तान को अलग थलग देश घोषित कर रहा है l भारत भी यही चाहता है की युद्ध न हो बस  पकिस्तान की ताकत इतनी क्षीण हो जाए की वो आतंकी गतिविधियों से तौबा कर ले क्योंकि युद्ध का दुष्प्रभाव पीढ़ियों तक  देशों को शारीरिक, मानसिक और आर्थिक तौर पर अपंग कर देता है l जब जब भारत का कोई नेता पकिस्तान गया या पाकिस्तान से कोई नेता दोस्ती करने के उद्देश्य से भारत आया तब-तब भारत में बम धमाका सुनने को मिला l इससे ये भी ज़ाहिर होता है कि पकिस्तान सरकार का वहाँ की सेना या आतंकियों पर कोई बस नहीं l आतंकी वहाँ छुट्टा घूमा भी करते है और सरकार कुछ नहीं कर पाती जबकि वो भी लाल मस्जिद और पेशावर जैसे दर्द झेल चुकी है l


पकिस्तान भला pok में २८ को हुए हमले से आहत हो भी क्यों ? वो असमर्थ बेबस खुद आतंक पैदा तो करता है दुसरे देशों के लिए ,किन्तु उससे ख़तम करने या सामना करने की ताकत नहीं रखता इसलिए व खुद जर्जर और मजबूर है वो अगर चाहता भी है कि  आतंक ख़त्म हो तो उसके पास इतनी ताकत ही नहीं है की वो उसे ख़त्म कर सके l अमेरिका द्वारा लादेन को मारा जाना और भारत द्वारा इतने आतंकियों का मारा जाना उसके लिए उपहार ही है l जो काम उसे करना चाहिए था उसे दुसरे देश कर रहे हैं l हम अपने घर के कीडेमकोडों के लिए कुछ न करे और बाहर के लोग आकर कीटनाशक से कीड़े नष्ट कर जाए तो हमें क्या दिक्कत  भला ? इसमें दूसरे देश का पैसा दूसरे देश की मेहनत  दूसरे देश की ही सैन्य क्षमता लगती है l तो आतंकवादी भी ये समझ ले की पकिस्तान भी उनका नहीं है जिसके दमपर वो कूदता फिर  रहा है जिसदिन कोई ढंग की सरकार पकिस्तान में आई वो सही साठ ढूँढ उसका खत्म कर देगी l

फिर भी नमुराद पकिस्तान ये मानने को तैयार नहीं की pok में ये हमला हुआ है क्यों माने भला तब तो उसे स्वीकारना होगा की पकिस्तान में आतंकवादी है या फिर ये स्वीकार करे की उसके ४० जवान मारे गए l वो अपने ही झूठ में फँस गया है एक तरफ कहता है हमला हुआ ही नहीं और ये विडियोस और फ़ोटोज़ भारत ने अपने ही देश में बनाई है जब की भारतीय जवानो के हेलमेट में कैमरे फिट थे जिसमे पकिस्तान को पुख्ता सुबूत  दिया जा सके क्योंकि वो बहुत पल्टउऊआ देश है l और दूसरी ओर वो इस घटना की निंदा भी करता है और दो सैनिकों का मरना स्वीकार भी करता है l ये कैसा दोहरापन है उसका l

अब सोचने का विषय ये है कि हमारे १८,१९ सैनिक शहीद हुए थे और हमने ४० आतंकवादी मारे हैं तो क्या इतने बदले से संतुष्ट हो जाना चाहिए ? क्या एक सैनिक की कीमत दो आतंकवादी है ? सैनिकों का परिवार होता है ,भावनाएं होती हैं , देशभक्ति का जज़्बा होने के कारण परोपकार का भाव होता है वो अच्छे घर के अच्छे संस्कारों में पले बढ़े होते हैं उनकी संताने अपने पिता पर गर्व करती हैं उनका नाम छिपाती नहीं  और घर ही क्या पूरा गाँव पूरा शहर पूरा देश उनपर गर्व करता है l एक सैनिक और आतंकवादी की क्या बराबरी ? आतंकवादी की तो लाश भी उसके घर वाले और पाकिस्तानी  सरकार लेने से मना कर देती है l कहीं से भी बच्चे चुराकर बचपन से उनमे घृणा का भाव भर उसे आतंकवादी बनाया जाता है l

सर्जिकल स्ट्राइक की घटना पर हमें मोदी जी के निर्णय और सैनिकों को बधाई देकर खुश होना चाहिए पर अभी और बहुत कुछ करना है  पाकिस्तानी सरकार की नीतियों को बदलने को विवश करना है क्योकि विवश करना ही उसके लिए ठीक शब्द है समझ में तो उसे आता नही l आतंकवादियों  को छेदते हुए उनकी आड़ में काम करने वाली सेना तक पहुँचना है l वहाँ की सेना से बैर इसलिए क्योंकि वो आतंकवादियों की आड़ में अपना काम करती है l वर्ना  किसी देश की सेना से हमारा कोई द्वेष नहीं सब खुश रहे अपनी सीमा में रहे l मैत्री भाव से रहें l  




Tuesday, September 13, 2016

लेख ---चन्दन चर्चित छवि तेरी .....क्या खूब हिंदी हो मेरी


हिंदी भारत की ही नहीं विश्व की सबसे अधिक समृद्ध शास्त्रीय और वैज्ञानिक भाषा है l जो भाषा की ध्वनियों को जैसे का तैसे रूप में प्रस्तुत करती है l देवनागरी लिपि अपेक्षा संसार की अधिकांश लिपियाँ अत्यधिक त्रुटिपूर्ण हैं l इसकी तरह संसार की कोई भी लिपि ध्वन्यात्मक और वैज्ञानिक नहीं है और इसको देश-विदेश के सभी विद्वानों ने एकमत हो मुक्त कंठ से स्वीकार किया है l स्वर और व्यंजन का बहुत स्पष्ट अलग-अलग विभाजन है l स्वरों में भी मूल स्वर पहले और संयुक्त स्वर बाद में बहुत स्पष्टता से आते हैं l इसका उच्चारण स्थान तालू, जिव्हा, कंठ आदि बहुत हिसाब से पूर्ण वैज्ञानिकता के साथ हैं l उच्चारण अंगों को ध्यान में रख कर बहुत साधना के साथ चिंतन मनन और विश्लेषण के इसका निर्माण हुआ है l
आज दुनियाँ के समस्त देशों में भारतीय रह रहे हैं l दुनियाँ के लगभग डेढ़ सौ देशों देशों में ढाई करोड़ भारतीय रह रहे हैं और चालीस देशों के ६०० विश्वविद्यालयों और विद्यालयों में हिंदी पढाई जा रही है l विदेशों में हिंदी में पत्र-पत्रिकाएँ छप रही हैं l अमेरिका की विश्वा और मारीशस की आर्यवीर और जागृति प्रसिद्द पत्रिकाएँ हैं l ये हर्ष का विषय है की भारत ही एक ऐसा देश है जिसकी पाँच भाषाएँ विश्व की सोलह प्रमुख भाषाओँ में शामिल हैं l

संयुक्तराष्ट्र संध में शामिल होने के भारत की केवल खड़ी बोली के हिसाब से सर्वे किया गया जिससे अभी उसका स्थान संयुक्तराष्ट्र संघ के लिए निर्धारी नहीं हो पाया l पर ये क्यों नहीं हो पाया ये विचारणीय प्रश्न है lअगर देवनागरी से उद्धृत बोलियों मराठी, राजस्थानी, नेपाली, पंजाबी जैसी तमाम बोलियों को मिला कर गणना की जाए तो हिंदी भाषा विश्व में प्रथम स्थान पर होगी l इससे संयुक्त राष्ट्र संघ में उसे शामिल हो जाना चाहिए l इसके अतिरिक्त जनसंख्या की दृष्टि से भारत दूसरे नंबर का देश है जिसकी आबादी लगभग १२५ करोड़ है जो दुनियाँ भर के अंग्रेजी भाषी से अधिक हैं l 

भारतीय आर्य भाषाओँ की सभी भाषाओँ का अपने क्षेत्र में विशेष स्थान हैं किन्तु हिंदी भाषा का एक विशिष्ठ और महत्वपूर्ण स्थान है l अवधि ब्रज बुन्देली डोंगरी कन्नड़ आदि अलग-अलग प्रदेशों में अपने स्थान के कारण प्रसिद्द हैं l इन बोलियों में खड़ीं बोली का अलग स्थान इसलिए है क्योंकि ये किसी विशेष स्थान से सम्बंधित नहीं है l शायद ये खरी से इसे खड़ी कहा जाने लगा है l खरी मतलब शुद्ध, प्राकृत, विशुद्ध l भारत में खड़ी बोली का क्षेत्र बहुत विस्तृत है पश्चिम उत्तर और पूरब में इसने अपनी शुद्धता के बल पर अपना स्थान बनाया है l वर्तमान समस्त साहित्य का मूलाधार खड़ी बोली है l अब इस खड़ी बोली में उर्दू फारसी का समवेश होने लगा है l यही खड़ी बोली भारत की राजभाषा, राष्ट्रभाषा और साहित्य  भाषा है l साहित्य में जो स्थान इसका है भारत की अन्य भाषाओँ का नहीं l  
     
इंटरनेट की दुनियाँ में हिंदी को नई उड़ान दी है l जहाँ इंटरनेट पर पहले अंग्रेजी का वर्चस्व था अब हिंदी का भी महत्वपूर्ण स्थान है l हिंदी में मेडिकल और इंजीनियरिग जैसी उच्च शिक्षायें भी हिंदी होने में होने लगीं हैं l सरकार प्रदेशीय हिंदी माध्यम के विद्यालयों में उसकी स्थिति सुधरने में प्रयासरत है l दुनियाँ की अधिक से अधिक भाषाओँ का ज्ञान और यथा समय अनुकरण करना बुद्धिजीवियों का गुण है उन सबके प्रति आदरभाव और ज्ञान के साथ ही हमें हिंदी को समर्पण भाव से अपना कर चलना है l अतः हिंदी की स्थिति किसी प्रकार से शोचनीय नहीं है l 

जहाँ तक वर्तमान साहित्य की बात है लेखन का स्तर गिरता ही जा रहा है हलाकि इंटरनेट पर कुछ विद्वान हिंदी की पुरानी गरिमा बनाये रखने के लिए परिश्रम के साथ प्रयासरत हैं पर उसका फायदा तो वही उठा पायेगा जो सीखना चाहेगा l आजकल लोग त्वरित प्रसिद्धि तो चाहते हैं पर अध्ययनशील नहीं हैं l ये सच है की साहित्य या काव्य ऐसा हो जो जन-ग्राह्य हो शब्दों का चयन बहुत समझदारी से और सुन्दरता से हो किन्तु ऐसा भी न हो कि वो इतना सरल हो जाये की उसका कुछ स्तर ही न रहे l हिंदी संस्कृत की तनया है और हिंदी, साहित्य सृजन में पूर्णतया अपनी माता का तिरस्कार कर दे ये भी उचित नहीं l हमारे लिए कोई चीज़ तभी तक कठिन होती है जब तक वो हमें उसका ज्ञान नहीं होता l हमारी हिंदी के सहस्त्रों शब्दों के महा शब्दकोश में हजारों शब्द काल कोठरी में पड़ी रूपसी की तरह बिना बाहर आये छटपटा छटपटा कर दम न तोड़ दे l लोचन, अक्षि, चक्षु, नैन, दृग जैसे सुन्दर शब्द हमने प्रयोग किये हैं इसीलिए वो सरल लगने लगे हैं l नाव का बोहित शब्द कितना खुबसूरत है पर उसका प्रयोग हम क्यों नहीं करते ? हिंदी के तमाम शब्द बहुत खूबसूरती के साथ शब्दकोश से बाहर लाना भी हमारा कर्तव्य है l एक-एक शब्द के दसियों दसियों पर्यायवाची हैं जिन्हें हम मात्राओं के हिसाब से प्रयोग कर सकते हैं l 
    
 अन्य भाषाओँ के ज्ञान और प्रयोग के साथ हम घर के बच्चों के समक्ष बोलचाल की भाषा हिंदी रखें तो पीढ़ी दर पीढ़ी हिंदी की सौगात हम अगली पीढ़ी को  अनायास ही भेंट करते रहेंगे इससे अन्य लोग भी सुनकर प्रेरित होंगे नई पीढ़ी में अपनी राष्ट्रभाषा के प्रति सम्मान बढेगा और हिंदी नित नई उचाईयों को हासिल करती रहेगी l

.....आदर्शिनी श्रीवास्तव ... मेरठ 

Thursday, September 8, 2016

कविता ----उस बिटिया की वो बिटिया दुनियाँ ही थी

उस बिटिया की वो बिटिया दुनियाँ ही थी
जिसके दुःख से
तड़प रहे थे कातर स्वर
स्तब्ध खड़े थे
दिग्दिगंत निशब्द वहाँ
कितना निष्ठुर है
 लीला करने वाला
उस मालिन को कुछ था
अपना होश कहाँ
उस बिटिया की वो बिटिया दुनियाँ ही थी
ज्वर से पीड़ित देंह
अशक्त ढीला-ढीला
मौन भी भय से
मौन खड़ा पीला-पीला
अवचेतन में जो भी शब्द
ठहरते मुख पर
दर्द में डूबे लावों से
गिरते थे सब पर
सब चुप थे पर कहते थे
वो कैसी होगी ?
उस बिटिया की वो बिटिया दुनियाँ ही थी
भीतर गाढ़ा रक्त हुआ
दुःख से तन का
क्रम साँसों का
काया में रह रह अटका
निश्छल बालापन था
नैनों में आता
छुप-छुप कर
खारे घट को था लुढ़कता
आवाक् खड़े थे
सब ढाढस देने वाले
उस बिटिया की वो बिटिया दुनियाँ ही थी

.......आदर्शिनी श्रीवास्तव..........












Wednesday, September 7, 2016

गीत -- मतवाले अहि को जो छेड़े कौन हुआ है दीवाना

नवजागृति का है संदेसा 
अवरोधों का बढ़ जाना 
मन के संकल्पों को किसने 
सुख के क्षण में पहचाना 

स्वप्न-नीड़ को छोड़ बटोही 
उड़ ले नील गगन में तू 
अब रच तू तारों का मण्डप
रह ले दीप-भवन में तू 
मणि रत्नों से भरा पड़ा है 
ह्रदय देश का तहख़ाना

हारे मन की रोक रागिनी 
उठ प्रस्तर से टकराने 
या उर्वर धरती को बंजर 
करके रख ले सिरहाने 
भीतर के हठ के स्रोतों को 
बह जाने दे मनमाना 

श्रीहीन इस मुखमण्डल को 
धो ले रवि की लाली से 
रीती के दे जो मन -वीथी 
कुछ मत चख उस प्याली से 
मतवाले अहि को जो छेड़े 
कौन हुआ है दीवाना 

...आदर्शिनी श्रीवास्तव ...



Wednesday, August 31, 2016

हंगामा है क्यों बरपा थोड़ी सी जो पी ली है

वैसे कुछ रोज़ पहले संदीप कुमार ने रोज़ अपनी पत्नी के पैर छूने की बात कही थी l किन्तु ये जरुरी नहीं कि उन्होंने असत्य ही कहा हो क्योंकि उन्होंने ऐसा बिल्कुल नहीं कहा था कि वो झुक कर अपने हाथों से अपनी पत्नी का पैर छूते हैं l वो खड़े-खड़े लात से लात भी मार सकते हैं l दुनियाँ में अबतक तो कोई भी महापुरुष ऐसा नहीं दिखा जिसका दंभ इतना कमजोर हो की वो पत्नी का पैर छू ले l हाँ पर संदीप कुमार जैसे लोगों को समाज के सामने अपने परिवारजनों के लिए समर्पण भाव दिखा चाटुकारिता कर पत्नी बच्चों की विश्वास में लेना ही पड़ेगा l वरना वे विश्वासघात कैसे कर पाएंगे? बाहर बच्चों और पत्नी से इतनी आसानी से गुल खिलने का मौका कैसे मिलेगा ?

दुःख है उस घर के सदस्यों पत्नी बच्चों के लिए जिसने अपने आत्मीय की कथा टीवी अखबारों में इस तरह देखी, पढ़ी और सुनी l एक पत्नी से अगर अब ये उम्मीद की जाए की वो पहले की तरह शांत भाव से अपने पत्नी धर्म का पालन करे तो ये उसके प्रति ज्यादती ही होगी l संदीप कुमार के बच्चों की मनःस्थिति सोच अफ़सोस होता है क्या सम्मान दे पायेंगे अपने पिता को ? या पिता का ऐसा घृणित आदर्श देख उनके व्यक्तित्व किस तरह से प्रभावित होगे ? वे भविष्य में सही रास्ता चुनेगें या गलत ? स्कूल, ऑफिस, समाज में किस तरह किसी की आँखों का सामना कर पायेंगे ?

'आप' के समर्थक इस बात से अवश्य फ़क्र महसूस कर रहे होंगे कि आधे घंटे के अन्दर ही केजरीवाल ने महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के मंत्री संदीप कुमार को पद से निलंबित कर दिया l इससे पहले भी जितेन्द्र तोमर को फ़र्ज़ी डिग्री के मामले में और आसिम अहमद खान को पैसे के लेन-देन के मामले में केजरीवाल पदच्युत कर चुके हैं l मगर क्या मात्र पद से हटा देना ही एक मात्र विकल्प है या दण्ड है ? पहले के दो लोग जो पद से हटाये गए उनपर क्या कार्यवाही हुई ? अगर ऐसे महत्वपूर्ण पद पर रहने वाले लोगो को उचित दण्ड नहीं दिया गया तो बात जबतक ताज़ी है दोषी चुपचाप बैठे रहेंगे फिर कोई नई पार्टी ज्वाइन कर पहले की तरह ही दुष्कर्म में लिप्त रह अलगी पीढ़ी को मानसिक नुक्सान और देश को असम्मानित करते रहेंगे l
......आदर्शिनी श्रीवास्तव ....

   

Tuesday, August 30, 2016

लेख --ताकतवर का कानून



जैसे-जैसे धर्मग्रंथों की शाखाएँ-प्रशाखाएँ निकलतीं गईं धर्म लोगों से दूर होता गया l वेदों और वैदिक मन्त्रों की ध्वनियाँ और यज्ञों के हवन की सुगंध धूमिल होती गई l लोग अलग-अलग वृतांतों से भ्रमित होने लगे तमाम बातों में अविश्वास बढ़ने लगा, विचारों की पावनता नष्ट होने लगी, नैतिकता शून्यता के कगार पर आ गई l
आजकल खुबसूरत से खुबसूरत पत्थरों, संगमरमर की बनी मूर्तियाँ मंदिरों में लगाने का प्रचलन जोरों से बढ़ रहा है l  मानव निर्मित मिट्टी, पत्थर की सुन्दर मूर्तियाँ हमें आकर्षित करती हैं हम उसे अपलक देखते रह जाते हैं मानव की उत्तम सृजनशीलता और ईश्वरीय आनंद में हम खो जाते हैं l मन भ्रमित हो कभी उस कला को देखता है कभी ईश्वर को खोजता है l इसके मतलब कि वो खुबसूरत प्रतिमाये हमारी आराधना में, ईश्वर से सीधे संपर्क में  व्यवधान डाल रहीं है l अगर कोई चर्च या मन्दिर, मस्जिद में आँखें बंद किये बैठा हुआ अपने विचारों को सांसारिक विषयों में भटकने देता है  तो ईश्वर अच्छी तरह समझते है कि उनकी पूजा नहीं हो रही किन्तु यदि कोई किसी धातु की मूर्ती के आगे झुककर उसे सर्वव्यापी परमात्मा का जीता जागता चिह्न और स्मारक मान तन्मय हो पूजा करता है तो ईश्वर उसकी पूजा अवश्य स्वीकार करते हैं l इसलिए मूर्ति पूजन कोई दोष नहीं ये ईश्वर से संपर्क की एक कला है l .......... किन्तु जब वो परमात्म भाव आस्था से खीच मूर्ति तक लाना ही हैं या जब ये कला आ ही गई तो मूर्ति की भी क्या ज़रूरत अब उसे सीखे ह्रदय तक ही क्यों न लाया जाए l     
वैदिक मन्त्र निराकार, सर्वशक्तिमान, अजन्मा, अनन्त, नित्य पवित्र सृष्टिकर्ता ईश्वर की उपासना करता है किसी निश्चित आकार की नहीं l पूजित होती है सिर्फ एक ज्योति, सिर्फ एक ओम............ जो भक्त का सीधा तादात्म्य जोड़ता है उस चिन्मय सत्ता से जिससे सर्वस्व संचालित होता है l उसमे किसी प्रतिमा का आकार, रंग, वेशभूषा व्यवधान नहीं डालती l
प्राचीन समय में मात्र सत्व ही धर्म था l बिना प्रतिमाओं के मात्र तपस्या और सदाचरण ही धर्म था l यही आध्यात्मिक लक्ष्य और आत्मिक उन्नति का मार्ग था l प्राचीन काल में लोग तपस्या कर अनेकानेक शक्तियों को उस सर्वान्तर्यामी से पा लेते थे l गीता, महाभारत, बाल्मीकि रामायण जैसे ग्रंथो में कहीं मन्दिर और मूर्ति पूजन का ज़िक्र नहीं है l हाँ यज्ञ के लिए सीता की प्रतिमा की बात अलग है l कहा जाता है की सर्वप्रथम तीर्थंकर पर्श्वनाथ, शिवलिंग, विष्णु जी की मूर्तियों का निर्माण हुआ l बाद में अन्य मूर्तियों का प्रचलन बढ़ा l उससे पहले ध्यान से ही पूजा की प्रथा थी l फिर तो बाद में धर्म ग्रंथों के महान पात्रों की मूर्तियाँ बनने का रेला ही शुरू हो गया l फिर पौराणिक ग्रंथों के छोटे बड़े पात्रों के भी मन्दिर बनने लगे l एक पत्थर रखा चन्दन धूप किया धीरे धीरे चहारदीवारी भी खिंचवा दी और पोंगा धर्माधिकारियों का झूठ और लूट का व्यवसाय चल निकला  l प्रयाग के मीरापुर क्षेत्र में पन्द्रह बीस साल से एक मज़ार रास्ते में पड़ती थी सूनी सी अकेली सी, देखते देखते एक रोज़ उसपर हरी चादर उढ़ा दी गई दुसरे दिन से उसपर अगरबत्ती की सुगंध महकने लगी l उस स्थान पर किसी का सोया स्वामित्व जाग गया l ...... सीधे-सादे भोले लोगों का सीधा संपर्क उस असीम अनंत सत्ता से टूट गया और पंडितों, मूर्तियों, लड्डुओं के आडम्बरों में फँस कर सर्वभूतान्तार्यामी तक पहुँचने की जद्दोजहद होने लगी l भला क्यों सुनते भगवान् ? भक्त आडम्बरों में लिप्त होते गए और धर्मस्थलों की दीवारों में उलझकर रह गए l किसी ने इसपर कीचड उछाला किसी ने उसपर l सही रास्ता छोड़ धर्म-धर्म लड़ पड़े l
इधर आडम्बर बढ़ते गए उधर ताकतवर का कानून सक्रीय होता गया l जिसमे जब ताकत आई उस उस जगह एक ढाँचा तोड़ दूसरा ढाँचा स्थापित कर दिया l जीता जागता और परतों में दबा इतिहास तेरे-मेरे की जंग पर अड़ गये l ताकतवर के कानून के पदाधिकारियों में एक तरफ धार्मिक आडम्बर था तो दूसरी तरफ दंभ और आत्मग्लानि को छुपाने का नाटक भी l वो दूसरों को बंधन में रख अपने स्वामित्व भाव से खुश हो पोषित होते रहे l पर एक दिन ऐसा आया की उस दंभ और स्वामित्व भाव से त्रस्त अपना अधिकार चाहने वाले नींद से जाग गए फिर तो जैसे धरती ही डोलने लगी और वो भूडोल घर, गली मुहल्ला, कागज पत्तर, बिजली उपकरणों को भी हिलाने लगा l ये भूडोल हर धर्म में एक जैसा था  किसी में कम तो किसी में कुछ ज्यादा ही l शबरी मन्दिर, सिह्नापुर महाराष्ट्र का शनि मन्दिर,  हाजी अली दरगाह इसी ताज़ा ताकतवर के कानून का परिणाम है l ......... पुराने समय की तरह इस समय भी ये पूजन स्थल न होते तो झगड़े का एक बहुत बड़ा विषय ही न होता l कुछ सेवार्थ आश्रम स्थल होते और कुछ थकित पथिकों के विश्रामालय बस l   
पूजने को इस जगत की प्रकृति का कण-कण ईश्वर प्रदत्त होने के कारण पूज्य है l जिसमे मानव और प्रकृति एक दूसरे में एकाकार होकर गुँथे हुए हैं l प्रकृति की शक्तियाँ मानव सेवा के लिए मिलजुल कर काम कर रहीं हैं l सूर्य, पृथ्वी, वायु, वर्षा मिलजुल कर मनुष्य के लिए अन्न फल उपजा रहे हैं l बस मनुष्य ये बात समझ उसे अपने हुनर से सवाँर कर लाभान्वित हो ईश्वर का आभार व्यक्त करना हैं l

तमाम पौराणिक ग्रंथों को पढने के बाद ये ही निष्कर्ष निकला कि नैतिक उत्थान, अहंकार का नाश, परोपकार और प्रत्येक काम करते हुए भी हमेशा मन में ईश्वर के प्रति आभार भाव ही धर्म है l फिर न घण्टों धार्मिक स्थलों पर पूजा आराधना की ज़रूरत न संसार से भाग कर जंगल में जा तपश्चर्या की l क्योंकि अगर संसारिकता से मन नहीं हटा तो पूजा आराधना व्यर्थ है l संसार के समस्त कर्तव्य करते हुए हर ख़ाली समय में अपने मन को उस असीम तत्व में खुद को निमग्न करन है जैसे एक उत्कट प्रेमी अपने संग को याद करता है l ईश्वर अवसर आने पर हर बात सुनेंगे l 
......adarshini srivastava......

    

Thursday, August 25, 2016

गीत .... कृष्ण ..... मेरी जल से हुई है गागर भारी

मेंरी जल से हुई है गागर भारी
हेरी सखी ...हम दोनों ही हैं सुकुमारी 
हाँ SSS मेरी जल से हुई.....l

छलिया है वो ताक लगाए 
मटकी फोड़ें मुझको भिगाए 
ऐसा है ब्रजनार वो नटखट 
लोग कहें.... ये हैं त्रिलोकी त्रिपुरारी
हाँ SSS मेरी जल से हुई.....l

माखन देख के जिया जुड़ावे 
क्षीर देख घर बाहर धावे
मोह भरे खीजत हैं यसुदा  
ओरे कान्हा.... काहे सताओ महतारी  

सखी जरा समझाओ पैजनियाँ 
आवेगा कस भरूँगी पनियाँ
छोरा निसदिन नाच नचावे 
हे री सखी..... कैसे पुकारूं गिरधारी

तुरत हुआँ पर आए कान्हा 
गगरी उठा सर धर दिए कान्हा 
लोचन बंकिम मार कटारी 
गोपी रहीं... भौचक अचंभित मनहारी 
....आदर्शिनी श्रीवास्तव....