Monday, June 13, 2016

कहानी .......न भूलने वाला उपहार

इतिहास को फील्ड वर्क के लिए कई शहरों में जाना पड़ता था l ­लेकिन फ़ील्ड वर्क के लिए इस वर्ष उसका मुख्य शहर हरकारा था l हर महीने आने के कारण होटल वाले से उसकी अच्छी बनने लगी थी l लेकिन हर बार वो माँ से डांट खाता कि वो हम लोगों के रहते हुए होटल में क्यों रहता है l माना मैं तुम्हारी सगी मौसी नहीं पर मंजरी मेरी सच्ची दोस्त थी उसमे और मुझमे भेद कैसा ? वो समझाता मौसी जी मेरे यहाँ रहने से आप लोगों को भी दिक्कत होगी और मुझे भी देर-देर रात तक जागना पड़ेगा तो लाईट के कारण आप सब भी डिस्टर्ब होंगे और कहीं आपलोगों के दुलार में बिगड़कर मैंने अपना काम पूरा नहीं किया तो मेरी तो वाट लग जाएगी l
माँ ने कहा था- अरे दिक्कत कैसी ? तुम अलग कमरे में रात भर लाईट जला कर रहो हम लोगों को कौन सी आँख में रौशनी लगेगी और दिनभर तो तुम फील्ड में रहोगे l कम से कम सुबह शाम ढंग का घर का नाश्ता और खाना तो खा सकोगे l
अतः वो हर माह पाँच रोज़ के लिए हरकारा आता l इस घर में वो सभी का सम्मानित और प्रिय था क्योंकि उसका व्यक्तित्व ही ऐसा था l शांत, संवेदनशील, सभ्य, सलीकेदार l जितने दिन भी रहता इस घर का सुख-दुःख उसका भी अपना होता l रात को घर के सारे सदस्य साथ में मेज पर इकट्ठे खाना खाते l
अनुभूति और इतिहास दोनों एक जैसे थे मितभाषी l जब महीने में पाँच दिन के लिए इतिहास घर आता तो दो दिन तो बात-चीत की ढंग से शुरुआत होने में बीत जाते l न इतिहास बोलता न अन्नू l बस काम-काम की बाते होती l फिर दो दिनों बाद धीरे-धीरे बात का सिलसिला लाइन पर आता l तो इतिहास के  जाने  का  समय निकट आ जाता l दिन भर तो घर  से बाहर रहता बबस शाम-शाम का समय होता बात करने को l मगर संवादों के आभाव में भी वे दोनों एक-दुसरे के दिल के काफी करीब थे l इसलिए अनुभूति और इतिहास अच्छे दोस्त भी थे l अनुभूति को इतिहास का आना अच्छा लगता था l वो समय आज के समय की तरह संदेहजनक नहीं हुआ करता था l सबका दिल स्वच्छ हुआ करता था, प्रेम में कलुषता नहीं थी l अनुभूति और इतिहास का बहुत पावन सा मधुर रिश्ता था l उस समय घर में सर्दी के दिनों में कोयले की अंगीठी पर खाना बनता जिसकी तपन आधी रात तक रहती l ठिठुरती ठंड में बरामदे में रखी अंगीठी के पास वो दोनों आग की गर्मी का सुख लेते l वैसे भी ठण्ड का मौसम हो अलाव जल रहा हो तो कौन जल्दी छोड़ना चाहेगा उसे l सभी बड़े थककर सोने चले जाते और वो दोनों वहाँ बैठकर बहुत सी बाते करते घर-परिवार, ऑफिस, स्कूल की l इतिहास बताता आज उसने क्या-क्या किया बाहर और अनुभूति को उसका बताना अच्छा लगता l
एक दिन इतिहास ने अनुभूति से कहा – अन्नू तुम मेरे कपड़े क्यों धुल देती हो ? मुझे अच्छा नहीं लगता अपना काम किसी से कराते l घर जाकर सब धुल जाते हैं अब इतना कपडा तो रहता ही है की पाँच दिल बिना धोये चल जाए l 
अन्नू ने कहा – अरे इसमें क्या हुआ सबका कपड़ा धुलता है तो आपका भी धुल जाता है l आप घर के सदस्यों से अलग थोड़ी हैं l ऐसा तो है नहीं आपके कपड़ों के लिए अलग से कुछ करना होता है l बाल्टी में सबका कपड़ा भिगोया आपका गंदा कपडा देखा तो उसे भी भिगो दिया l
इतिहास ने कहा – फिर भी.... कुछ भी हो मेरा कपड़ा आज से मत धुलना l
अनुभूति ने मुस्करा कर कहा – ओके बाबा अब नहीं धुलूँगी l खुश ? फिर वो दोनों सोने चले गए l
घर का बाहरी कमरा गेस्ट रूम की तरह काम आता l जो मेहमान आता उसमे सोता l उसका एक दरवाज़ा बाहर खुलता, बायाँ दरवाज़ा मम्मी के कमरे में जिसका आधा हिस्सा ड्राइंगरूम था आधे में दो पलंग, और दायाँ दरवाज़ा छोटे बरामदे में खुलता था l   लेकिन साधारण दिनों में अनुभूति बाहर के कमरे में ही पढ़ती क्योंकि वहाँ की अलमारी में ही उसकी कॉपी किताबे रखी थीं l जब इतिहास आता तो रात के समय वह वहाँ पढना छोड़ देती थी और पढने योग्य किताब वहाँ से उठा लाती l बड़े हॉल में वो और मम्मी सोती और वहीँ वो पढ़ती भी l एक कमरा भैया-भाभी का था l एक बॉक्स रूम , एक पूजा का कमरा , एक स्टोर जिसमें अनाज का भण्डार हुआ करता था l उसी के बगल एक खाली कमरा और था जिसमे खूब  बड़े-बड़े बरतन, फूल और पीतल के खुबसूरत बर्तन, हुक्का आदि आदि जाने क्या क्या रखा था l बड़ी बड़ी दो इज़ीचेयर भी थी l बड़े बरामदे में खाने की मेज लगी थी जिसपर सब सुबह-शाम एकत्र जरुर होते l 
अनुभूति ने एक बार इतिहास की खाने और कपड़े की पसंद जाननी चाही थी पर इतिहास ने कहा कि खाना सब अच्छा होता है l वो खुशनसीब है जो सुख से खा पा रहा है वरना कितने ही लोगों को भूखे रहना पड़ता है l उसने मुस्करा कर कहा था हमें तो रोटी-नमक सबसे प्रिय है .........l हाँ पर हमें गुलाबी रंग पसंद है और सरपर दुपट्टा रखे लडकियाँ l गुलाबी दुपट्टा सरपर हो तो क्या बात l अनुभूति को इतिहास से इतना लगाव था की वो उसके लिए रुच-रुच उसकी पसंद का खाना बनाती वैसे तो खाने के विषय में इतिहास ने कभी अपनी पसंद बताया नहीं था और वो हर खाने को पूरी श्रद्दा और चाव से खाता l पर अन्नू को लगता कि जो उसे पसन्द है इतिहास को भी वही पसंद आएगा और शायद ऐसा ही था l एक दिन आटा माड़ते वक्त उसने और आटा लेना चाहा क्योंकि उसे कुछ कम लग रहा था पर दिव्या ने कहा – नहीं और मत लो, ठीक है, अगर बच जाए तो या बासी खाओ या फेंको l दोनों ही करना अच्छा नहीं लगता l कोई गाय भी तो इधर नहीं आती, किसे खिलाएं l अन्नू को मन था की आज वो साथ में खाना न खाए सब लोग खालें तो जो बचे वो खुद खा लेगी l पर कुछ बहाना न चला उसे सबके साथ बैठा ही पड़ा और उसे लगा आज इतिहास की क्षुधा तृप्ति नहीं हुई थी l वो खूब रोई l उसने भगवान से प्रार्थना की जब उसका विवाह हो जाए तो इतिहास की वर्किग इस शहर से भी हट जाए l क्योंकि उसके जैसा अपनापन इतिहास को कौन दे पायेगा l 
अनुभूति के पापा की नौकरी के एक वर्ष ही शेष थे l वे चाहते थे की अन्नू का ब्याह नौकरी करते ही हो जाए l नौकरी के रहते कैम्पस में ही अच्छी खासी जगह मिल जाती है, नौकर-चाकर, कर्मचारियों का सहयोग सब उपलब्ध हो जाते हैं पर रिटायर्मेंट के बाद कौन किसको पूछता है चाहे कोई जितना बड़ा ऑफिसर हो l एक जगह बात चल भी रही थी l इतिहास उसे कभी छेड़ता तो उससे कहती –तुम मुझे शादी में क्या उपहार दोगे ? वह कहता दूँगा ऐसा उपहार जो तुम भुला नहीं पाओगी l दोनों हँस देते l  
आज रात फिर अंगीठी के पास इतिहास ने पूछ लिया कही मेरी रेड-ब्लैक वाली शर्ट नहीं दिख रही, धुल दिया क्या ? अन्नू ने डरते-डरते स्वीकृति में सर हिला दिया  l
इतिहास ने शान्तभाव से कहा- ( क्योंकि कभी इतिहास को उग्र या उत्तेजित होते देखा नहीं गया था l उसका गुस्सा भी शांत ही होता ) मेरी शर्ट लाओ आज उसे अंगीठी में डाल देंगे l
अनुभूति ने कहा- अरे कोई बात नहीं धुल दिया तो क्या हुआ? आप इतना सोचते क्यों हैं ?
लेकिन इतिहास जिद पर अड़ा रहा , नहीं अभी लेकर आओ तुम जो भी मेरा कपड़ा धुलोगी हम अंगीठी में डाल देंगे l
अन्नू ने अपना कान पकड कर कहा – ओके अब नहीं धुलुंगी... सच..., पक्का वादा...., गुस्सा छोड़ो..... आज से सब सेवा समाप्त l दोनों हँस दिये थे l
इसीतरह वो हर माह पाँच दिन के लिए आता l दो दिन संकोच में बीत जाते l बचे तीन दिन वे हँस-बतिया बिताते l दोनों में बहुत आत्मीयता थी l आज अन्नू ने गुलाबी शलवार-सूट पहना था और गुलाबी दुपट्टा सर पर रखा हुआ था l उसे लग रहा था आज वो बहुत सुन्दर लग रही है l इसलिए वो भीतर से भी खुश-खुश थी l वह सुन्दर थी भी l छरहरा सामान्य लम्बाई का शरीर, आँखे कजरारी हमेशा हया से लदी हुई , तराशे होठ, आवाज़ में लखनवी अंदाज़ का सलीका l एक बार इतिहास ने अन्नू से कहा भी था – “ तुम्हरी आँखें अभिनेत्री नंदा की तरह हैं l”
एक सप्ताह बाद ही अन्नू का एम०ए० द्वितीय वर्ष की परीक्षा आरम्भ होने वाली थी l अब उसे कोर्स कम्प्लीट करना जरूरी था l फिर भी उसे इतिहास का आना अच्छा लगता था क्योंकि वो स्वयं ही समझदार था l परीक्षा निकट जानकार इतिहास कभी उसकी पढाई में व्यवधान नहीं बनता l बल्कि उन दिनों वो अन्य लोगों के बीच ज्यादा से ज्यादा रहता l रात में भी अंगीठी तापने के बजाये कहता “तुम जाओ पढ़ो मैं भी कुछ ऑफिस का काम ख़तम कर लेता हूँ l“.........  अभी इतिहास के आने में समय था l अन्नू बाहर वाले कमरे में पढ़ रही थी l वो तन्मयता से पढाई कर रही थी यहाँ तक की खो सी गई थी किताबों में l शाम का धूँधलका छाने लगा था l तभी किवाड़ ढकेल इतिहास ने दरवाज़ा खोला और सामने बैठी अन्नू उसे बहुत प्यारी लगी l अनायास ही उसने अन्नू के गाल पर चुम्बन अंकित कर दिया l साथ ही अचकचा कर स्वतः ही अन्नू का हाथ तड़ाक से उसके गाल पर चला गया l यह उससे कैसे हो गया उसे समझ में नहीं आया l उसे ये तो मन था की वो अच्छी लगे पर उसने इसकी कल्पना नहीं की थी l  वो अपनी हरकत पर शर्मिंदा भी हुई l सॉरी बोल वो उठकर अन्दर चली गई फिर दो दिन दोनों में बोलचाल नहीं हुई l दोनों को क्रिया और प्रतिक्रिया दोनों बहुत स्वाभाविक लग रही थी l दोनों जानते थे कि दोनों का प्रेम निश्छल प्रेम है l इस गाल के चुम्बन में भी प्यार था वासना कदापि नहीं l
अन्नू के विवाह में वो अन्नू के साथ-साथ रहा l उसे छेड़ता रहा हँसता बतियाता रहा जबकि वो जानता था अब बिना अन्नुके  हरकारा उसे अच्छा  नहीं  लगेगा l ......अन्नू के विवाह के दो रोज़ बाद ही अन्नू को पता चला की इतिहास की वर्किंग का मुख्य शहर अब हरकारा से हट कर कोई और शहर हो गया है l उसे संतोष हुआ l
इतने वर्षों बाद भी जब कभी कही दोनों की मुलाकात हो जाती तो दोनों का प्यार पहले की तरह ही है निश्छल, पावन l हमेशा टिके रहने वाला, क्योंकि दोनों ने एक दूसरे से कभी कुछ नहीं चाहा था बल्कि एक दुसरे की चिंता ही की थी l बस प्यार किया बिना किसी शर्त बिना किसी लोभ के l
दोनों ही जानते थे कि उस दिन का आकस्मिक बोसा बस प्यार था l अपनापन था l दोस्ती थी l फिर उसकी कभी चर्चा कभी नहीं हुई l शायद वो अन्नू को शादी में कभी न भूलने वाला उपहार था l
........ आदर्शिनी श्रीवास्तव ..........मेरठ 
३०/५/२०१६ 

Sunday, June 12, 2016

ग़ज़ल ....रूह हूँ मैं जिस्म है वो

रूह मैं हूँ जिस्म है वो है सच्चाई दोस्तो
मैंने अपने जिस्म से ही चोट खाई दोस्तो

सच कहूँ उससे अलग मैंने कभी सोचा नहीं
कर रहा है फिर भी मुझसे बेवफ़ाई दोस्तो

मैं हूँ नदिया तू समंदर मैं हूँ झरना प्यास तू
प्यास सागर से किसी ने है बुझाई दोस्तो

दिल उसे मैंने दिया पर जान ही वो ले गया
खूब क्या उसने वफ़ा मुझसे निभाई दोस्तो

आज सारा दर्द घुलकर है नुमाया हो रहा
चाँदनी की रात है औ' है तन्हाई दोस्तो

जीत का अपनी ख़ुशी से ताज उसके सर रखा
बात उससे ये अभी तक है छुपाई दोस्तो

जो नसीहत माँ ने दी थी शर्म की तहज़ीब की
दिल जिगर से वो नसीहत है निभाई दोस्तो

Saturday, June 11, 2016

गीत ....फिर मेरी अंजुमन को सजाता हुआ


फिर मेरी अंजुमन को सजाता हुआ
और तसव्वुर का दर खटखटाता हुआ
कौन आया है दिल में समाता हुआ
ख़ाब में नींद में गुनगुनाता हुआ

एक अहसास मूरत में ढलने लगा    
पास आकर गले मिल के कहने लगा
जो हक़ीक़त में सम्भव न अबतक हुआ
हो गया ख़्वाब में सब भुलाता हुआ

स्याह रातों में महताब शरमा गया
चाँद से रूप उसका जो टकरा गया
प्यार पर है निछावर जमीं आसमां
आया तारों में वो झिलमिलाता हुआ

फिर अँधेरों की बदरी सिमटने लगी
एक गुलाबी किरण से चटकने लगी
साथ जो था रहा रात भर ख्वाब में
चल दिया हाथ सुबह छुड़ाता हुआ
....आदर्शिनी श्रीवास्तव ......


Saturday, June 4, 2016

गीत .... तस्वीर बनाने बैठूँ

तस्वीर बनाने बैठूँ जब लेकर सुधियाँ तेरी
खुद ही चलकर आ जाती कूची संग रंग कटोरी

हरपल हरसू तुम दिखते हो
मुख पर हँसी बिखेरे
मैं हतप्रभ हो ताकूँ तुमको
लगते बहुत चितेरे
धीरे-धीरे इन क़दमों से
आया कौन अरे-रे
ये कैसे आ बैठे घर में
सोचूँ रात अँधेरे
ये क्या किया ढरका दिया मेरे आँचल पर रोरी

मन में उठी जल-तरंग में
उछले सौ-सौ मोती
इन मोती में नेह लुटाती
छवि तेरी ही होती
भूल गई लो चित्र बनाना
मन-का मनका पोती
ह्रदय-पटल पर अभिलाषा के
सुन्दर सपन सँजोती
लो पट्टिका तो रह गई तुम बिन कोरी की कोरी
......आदर्शिनी श्रीवास्तव .....

Friday, June 3, 2016

गीत ... बसंत --- सँवर गई वसुंधरा ----



लो सोलहो सिंगार कर सँवर गई वसुन्धरा
विवश हुए हैं देवता भी देखने को ये धरा

गगन से छन उतर रही
है गुनगुनी सी धूप अब
निखर-निखर, बिखर रहा
है रूपसी का रूप अब
अनेक पुष्प रंग से
सजा हुआ है आँचरा
समय की कर उपासना
समीर अनवरत बहा
देख ऋतु बसंत को है खुश हुआ पपिहरा

किरण को ओढ़ दूर्वा
हुई है और मखमली
गुलाल गाल हो गए
सजा के ओस जब चली
निरख रहा है दूर से
हेमंत कुछ डरा-डरा
लो एक वर्ष के लिए
मैं अब ढहा कि तब ढहा
लता का पीत पात ज्यों सुवर्ण पत्र हो खरा

हवा में पुष्प गंध की
लहर रहीं हैं चादरें
पलाश बिछ जमीन को
लगा रहा महावरें
बसंत से सजी धरा
सम्हल-सम्हल-सम्हल जरा
अनंग मद की आपगा में डुबकियाँ लगा रहा

पलक-पलक निहारते
सभी इसे हैं प्यार से
कि जैसे पंखुड़ी को ओस
छू रही दुलार से
नक्षत्र दीपिका लिए
है ज्योति नग झरा-झरा
गगन के बीच चन्द्रमा
है मंद-मंद हँस रहा
नशे में सप्त स्वर हुए खिला खिला है मोंगरा
......आदर्शिनी श्रीवास्तव ........
गीत -- परिवर्तन
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परिवर्तन तो प्रकृति की सहज प्राणधारा है
जिसपर हमने वर्तमान को शनैः-शनैः वारा है

इस प्रकृति में सहज भाव से
पल-पल बहते जाना
या केवल निष्काम भाव से
कर्म को करते जाना
सम्हल-सम्हल कर बदलावों को
 खुलकर स्वीकारा है
जिसपर हमने वर्तमान को शनैः-शनैः वारा है

हम न जाने कब अपना मन
ही चुपके से बदलें
फिर पिछले मन को सींचें
या बदलेपन का सुख लें
हर क्षण, हर पल बदल रहा
परिवर्तन बंजारा है
जिसपर हमने वर्तमान को शनैः-शनैः वारा है

परिवर्तन में नवरसता,
नवचेतन, नवआकर्षण
सुख में दुःख का दुःख में सुख का
शीतल सा जलवर्षण
भावों जैसा व्यभिचारी
ये धुँधला-उजियारा है
जिसपर हमने वर्तमान को शनैः-शनैः वारा है
........आदर्शिनी श्रीवास्तव ........
गीत - लो हवा की तरंगे भी दुल्हन हुईं
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कुछ ठहर कर चलीं कुछ झिझक कर चलीं
लो हवा की तरंगे भी दुल्हन हुईं

काकली कूँज से मन हुआ बाँवरा
बंसवारी में गूँजा स्वतः दादरा
कामनाओं से कम्पित हो काया नगर
चूड़ियों-नूपुरों की छननछन हुईं

झोर पुरवा चलीं झोर पछुआ चलीं
घेर कर हर तरफ से हुईं मनचलीं
सबसे छुपकर पवन आँचरा ले उड़ा
धड़कने जिस्म की हैं सुहागन हुईं

टहनियों से मिलीं टहनियाँ झूमकर
फूल खिलने लगे मौज में डूबकर
बरखा आँगन में बरसी बिना बादरी
नर्म माटी ही चन्दन का लेपन हुईं

एक स्वस्तिक पवन प्रेमियों के लिए
फूल झरने लगे वेणियों के लिए
एक मीठी छुअन कोरे अहसास की
सारी बगिया ही मानों तपोवन हुईं
.....आदर्शिनी श्रीवास्तव ....

Thursday, June 2, 2016


गीत
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क्या हुआ तटबंध क्यों फिर आज बौने हो गए
पीर तो उसकी थी लेकिन नैन क्यों मेरे झरे

ये ह्रदय की वेदना है
या कोई संत्रास है
हर तरफ क्यों एक जैसी
छटपटाती प्यास है
आज कितनों के हज़ारों ज़ख़्म हो बैठे हरे

पत्थरों के बीच भी तो
छलछलाता नीर है
हो भले मरुथल वहाँ भी
बह रहा समीर है
एक सरवर ही उपेक्षित हैं सभी सरवर भरे

ज़िन्दगी के विष को जिसने
मधु समझकर पी लिया
इन विसंगति में हँसा जो
वो समझ लो जी लिया
शीत घन के साथ बिजली है समझ से भी परे

.......आदर्शिनी श्रीवास्तव ......

मुक्तक

     

हो दो हृदयों का मौन मिलन
तब कथ्य कहाँ सब अनिवर्चन
बस हो आँखों में शोर बहुत
निःशब्द मनोगत गठबंधन
.....आदर्शिनी श्रीवास्तव

गीत .... ओह बरगद छाँव वाला



ओह! बरगद छाँव वाला वृक्ष कैसे ढह गया

वट के हरियाले सघन से
ये धरा रीती हुई
याद ही है अब सुरक्षित
नेह को जीती हुई
आत्मबल का भाव देकर हमपे कर अनुग्रह गया

प्राणवायु के बिना हैं
पौध सकते में खड़े
सहमे-सहमे देखते हैं
फाड़ नैना पाँवड़े
सब निशानी छोड़ पीछे वो समय सा बह गया

वो सुयश, रस का कलश
था प्रेम पल्लव से लदा
उसके वैभव पर निछावर
थी जगत की सम्पदा
ज्ञान, परउपकार वाला कोश का संग्रह गया

चाह थी विश्राम की पर
ये निरंतर का सफ़र
दैव-प्रेरित रास्तों का
डोलता उसपर चँवर
ये सफ़र रुकता नहीं स्वीकार वो आग्रह गया
......आदर्शिनी श्रीवास्तव .......( हरिद्वार में तातश्री के निधन पर )


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