Monday, October 10, 2011

भावस्रोत बहने दो आज

रोपा बीज आज पुलक रहा है,
आतुर है कुछ कहने को,
मुस्काकर वो झाँक रहा है,
ऊपर गिरती बूँदों को,
शीतल सिक्त उर मचले मेरा,
बाँहों में भर लेने को,
बरस ले तू झूम-झूम, मै
बैठूँ हार पिरोने को,

मेघों को तू समझ ले काजल,
बदरी को अलकें बनने दे,
नैनो को दोना तू कह दे,
कन्चे पुतली को बनने दे,
अधर बने गर पंखुडियाँ,
अलिनी सी बोझिल पलकें हों,
कुंभ मदिरा से भरा लगे,
विधु को मुखड़ा तू बनने दे,

उलझी डाली का घेरा,
तुझको बाँहों का हार लगे,
मृगया कि चंचल गति,
तुझको मधुबाला कि चाल लगे,
कंपन से छनके पैजनियाँ,
पग-तल गुडहल का फूल लगे,
डग-डग कि कोमलता ऐसी,
वसुधा हरियाली दूब लगे,

उदित भाव में आज पिया,
तू अपने शब्द पिरोकर देख,
पीर हरेंगे वो निश्चय ही,
तू बौछार उड़ाकर देख,
भावों को दो छोड़ निरंकुश,
स्वच्छंद उसे बहने दो आज,
घर-संसार संग बदले अंतस,
तू वो गीत सजा कर देख,

नहीं फिकर कर ओ बाँवरी,
भावस्रोत बहजाने दो,
क्या होगा और क्या न होगा,
बात परे हट जाने दो,
अंतर्मन जगा कर देखो,
प्यासी कलम पुकार रही,
पृष्ठ-पृष्ठ छूने दो उसको,
धार और घिस जाने दो,
अलकें=बाल
अलिनी=भ्रमरी
विधु=चंद्रमा
वसुधा=धरती

Sunday, October 9, 2011

वर्तिका बन खुद को जलने दे

पालक भांति चल चुकी बहुत तू ,
कर्तव्यों से कुछ उठ चुकी है तू ,
कर चुकी बहुत विश्राम लेखनी ,
अब खुद की खातिर कुछ जी ले तू,

दीपक रख मन में तू सजनी,
वर्तिका बन खुद को जलने दे,
पसरेगा उजियार जो पगली,
जग को उससे तू सजने दे,
स्वच्छ निर्मल तेरे मन ने,
जो भी सोचा सब कह डाला,
अब घुट-घुट कर निकले जो भी ,
पन्नों पर उसको बहने दे,.....................वर्तिका=दीपक कि बत्ती

तू प्रेयसी बन खोल जरा,
अपने भीतर के रस घट को,
छलका दे प्रेम पियूष सुधा,
उतराने दे उसमे जन-जन को,
पतंगों का मन मचले जिससे,
ऐसे रस में तू गान करे ,
रिक्त मनस न शेष रहे,
प्रेमिल कर दे हर मानस को, ............घट=गगरी
सुधा=अमृत
मनस=मन,बुद्धि
मानस=इंसान

जाग विरहनी! तू भी अब,
वदन ढांप कर क्या होगा,
चल खोल हृदय को तू भी तो,
रोने धोने से क्या होगा,
शब्दों-शब्दों में वो करुणा हो,
जो मन को विह्वल कर जाये,
अश्रु बहे इस लय में ऐसे,
तरणी भी उसमे तिर जाये,................वदन=चेहरा
विह्वल=व्याकुल
तरणी=नौका

लोग जान लेंगे तुमको कि,
तुम भी एक वीरांगना हो,
जान डाल कर फूंक शंख तू,
छंद-छंद अंगारा हो,
जोश उफन कर निकले ऐसे,
जैसे उबला दूध बहे,
शांत रहे न कोई यौवन,
सबके भीतर एक ज्वाला हो,..............वीरांगना=वीर स्त्री

कभी बरस बदरी के जैसी,
कभी तड़ित का वह्नि बने,
हास्य व्यंग छिटका तू ऐसी,
आनन-आनन गुलाब बने,
रीति रंग में भिगोकर फेंको,
फूलों कि पिचकारी को,
देश भाव जब जगे हृदय में,
मानव मन हा हाकार करे .........................तड़ित=आकाश कि बिजली
वह्नि=अग्नि
आनन=मुखड़ा

Friday, October 7, 2011

बार बार ये क्यों होता है

........बार बार ये क्यों होता है........

बार बार यह क्यूँ होता है
मेरा मन विचलित क्यूँ होता है
प्रेम अगर सच्चा है मेरा
दोष तुम्हे यह क्यूँ देता है

इच्छायें करती हूँ तुझसे
चाहत की चाहत है तुझसे
सच है या फिर भ्रम है मेरा
के तुम बिछड रहे हो मुझसे

सुनती आई हूँ मै सबसे
निष्काम प्रेम में रब होता है
तथ्य बिसर यह क्यूँ जाता है
प्रेम सरल निर्मल होता है

याद करो इसको मन मेरे
प्रेम का अंकुर जब फूटा था
अपेक्षा का कोई भाव न था
देने का सुख ही स्वभाव था

प्रेम एक विस्तार भाव है
विधाता का इसमें प्रभाव है
सीमाबद्ध बनाकर इसको
प्रतिइच्छा की इच्छा कुभाव है

फिर आशीष मिले यदि तेरा
दिल में कोई आस न पालूं
तेरे दीप जले जो मन में
उस दीपक को हरदम बालूँ

तुम मेरे हो प्राणप्रिये
मेरा भी क्या है मेरा?
नहीं जानती विवश हो तुम
या बदला है मन तेरा

किन्तु सत्य मानो हे प्रिये
मै बिल्कुल पहले जैसी हूँ
अंतस से तुम देखो मुझको
मै भी तेरे जैसी हूँ

पथदर्शकहे ,मै अनुगामिनी तेरी
चंदा तुम मै लहर तेरी
उपकार तेरा इतना होगा
मनबद्ध रहो हे प्रीत मेरी

Thursday, October 6, 2011

मेरी यादों में मत आना

मेरी यादों में मत आना

तेरी यादों से जगता है मेरे मन का कोना कोना

मेरी यादों में मत आना


प्रभाती नव नवेली जब अपना घूंघट सरकती है,

लाली से अपनी धीरे-धीरे धरती का रूप सजती है,

निशि विछोह की पीर,प्रभा जब ओस रूप दिखलाती है,

तेरे यादों से आता है तब हृदय बिम्ब में रूप सलोना

मेरी यादों में मत आना


सागर में तिरते मोती को जब प्यासा मृग पी जाता है,

अपने अधरों से चूम चूम हंस, क्षीर-क्षीर पी जाता है,

नीले नैनो की बरसाते दिल को ढांप ले जाती है,

पीर हृदय को दे जाता है तेरी यादों का शूल चुभोना

मेरी यादों में मत आना


अम्बर के काँधे पर जब बदरी का कुन्तल होता है,

धीरे-धीरे अम्बर का गर्जन स्वनगुंजन सा लगता है,

लरज लरज अम्बर औ बदरी खुशहाली दरशाती है,

तुझसे ही लिपटा होता है भीतर का मेरे हर एक तराना

मेरी यादों में मत आना


कमलपत्र जब शबनम को अपने हाथों में लेता है,

सूर्यरश्मि से मुखड़ा उसका जुगनू की तरह चमकता है,

संदली बयार जब आस लिए अक्षि तृषित कर जाती है,

बिखर जाता है यादों का था जो अब तक बंद खजाना

मेरी यादों में मत आना

तेरी यादों से जगता है मेरे मन का कोना कोना

मेरी यादों में मत आना

आदर्शिनी

क्षीर=दूध

कुन्तल=गेसू

बिम्ब=आकृति

स्वन=शब्द

संदली बयार =सुगन्धित पवन

अक्षि=नयन

तृषित=प्यासा


Friday, September 30, 2011

देखो मैंने देख लिया

दो रोज की यायावरी में सारा आलम देख लिया
कुछ अपनों के संग ही मैंने दुनिया वालों को देख लिया

अपने ही हाथों से काटे कितनी बार पंख मैंने
अनसुलझे कुछ सुलझे भावों की लुकाछिपी भी देख लिया

नैन कटोरों में जल भर कर धूमिल तेरी छवि कई बार करी
हिलते डुलते सागर में भी तेरा रूप निराला देख लिया

पूरा अपना समझा जिसको उसको पल पल छिनते देखा
बारिश का कुछ पल को आकर झलक दिखाना देख लिया

कुछ संशय का भाव भी जागा कुछ ईर्ष्या के भाव जगे
प्रीत की बरखा देखी भावों में, सुनैनों का मद भी देख लिया

बहुत किया तुमने फिर भी तुम नारी मन को क्या जानो
दिल रखने को कुछ ही क्षण को तेरा पास बुलाना देख लिया

सच कहती है दुनिया सारी तुम नहीं किसी के लिए निष्ठुर
अल्पकाल में चन्दन सा मुझको लेप लगाना देख लिया

इसको भी सहो और समझो ये भी जीवन का एक पहलू है
ईश तुम्हारा ये खामोशा ईशारा भी देखो मैंने देख लिया



Thursday, September 29, 2011

प्रेम अनिवर्चनीय यहाँ

नदी का नदी में विलय देखो
कितना अद्भुत है ये संगम देखो
एकता तो है नदी की नदी से मगर
पृथक भावों का विलक्षण प्रवाह देखो

अलग हो कर भी जो दिखती यहाँ एक हैं
एक होकर भी जिनका उद्गम है अलग
ज्ञान के चक्षु अब तो उकेरो जरा
ईश्वर का जगत को ये संकेत है

किसका निमंत्रण है किसका समर्पण है ये
चरम पर पता ये कैसे चले
प्रेम में हो लींन नदिया अद्वैत हो गईं
अब शांत समता का भाव प्रबल देखो

प्रेम अनिवर्चनीय यहाँ प्रेम अकथनीय यहाँ
वो क्या समझे, ईश्वर को पृथक जो जगत से करे
निर्लिप्त भावों से प्रेम जगत से करो
पूर्ण निष्ठां से सेवा तुम सबकी करो

Friday, September 16, 2011

बदरी



ये सच है तपन पहले जैसी नहीं
किन्तु बदरी है जो हटती भी नहीं
है ज्वार सा उठता सुनामी कभी
धीमी लहरों की ठंडी थपक है कभी
रह रह के हृदय ढांप लेती है वो
आ जाती है फिर जल्दी छंटती नहीं

गोरे गोरे मुख पर ओढ़े एक चुनरिया झीनी सी
तनिक छुपे फिर तनिक दिखाए जब उड़े चुनरिया झीनी सी
श्वेत मेघ से तन को ढांपे,श्याम मेघ से रूप छिपाए
नभ पर खूब सजे तू सजनी,कुछ बरसा बदरिया झीनी सी