Thursday, October 17, 2013

पर्वों पर जनहित में जारी

हम व्यर्थ ही प्रकृति को कहर का दोषी ठहराते हैं जिस तरह हम प्रकृति से खिलवाड़ करते है इस विषय पर आत्मावलोकन कर खुद महसूस कर सकते हैं ....दुर्गा पूजा बंगालियों का प्रमुख त्यौहार है और कलकत्ता में धूमधाम से मनाया जाता है l
हमारे एक बंगाली बड़े भ्राता सरीखे मित्र से जब बात हुए तो वे बहुत दुखी थे उनका मानना था कि अब प्रकृति पर विभिन्न तरीकों से बहुत चोट पहुँच रही है तो हमें अपने को बदलना चाहिए l लकीर के फकीर कि तरह हम समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों से मुँह नहीं मोड़ सकते l गलत को नकार, विवेक से सही के बदलाव को स्वीकारने की अब हम में समझ और क्षमता है l उन्होंने बताया कि मैं मूर्ति विसर्जन करने नहीं जाता ...मुझसे नहीं देखा जाता ...जिसकी नव दिन सजा संवराकर भक्तिभाव से पूजा करो उसे जैसे तैसे नदी में बहा दो l जबकि विसर्जन हर शहर में होता है पर उतना पानी सब जगह नहीं होता और खण्डितमूर्ति और पूजन सामग्री किनारे पर रह जाती है जो जल और थल दोनों को गन्दला करती है औरउस मूर्ति और पूजन सामग्री का अपमान भी l आज fb पर ही दिखा की दुर्गा माता को किसी धनाड्य ने १६ करोड़ का ५.५ लाख किलो घी चढ़ाया है l तस्वीर में लोग उसपर खड़े दिख रहे हैं l जब ये सब पानी में जायेगा तो पानी को कितना प्रदूषित करेगा और स्थल कोभी......

कृपया आगामी वर्ष तक इसपर विचार कर लें ..वर्ना जाने कितने सुनामी, फाइलीन और केदार नाथ जैसी विपत्तियाँ हमें धर दबोचेंगीं l ............जनहित में जारी......आदर्शिनी श्रीवास्तव , मेरठ


Friday, March 8, 2013

महिला दिवस पर ----हमें बदलना होगा

Sunday, February 24, 2013

प्रतिबिम्ब

आज पर अतीत का
प्रतिबिम्ब ही हूँ लख रही
संभाव्य को दे आत्मा
मैं आज कल जीने लगी हूँ
उलझी हुई एक डोर थी
सुलझी न मुझसे अब तलक
तन पर गिरा एक जाल है
जिससे अभी निकली नहीं हूँ
अर्थ जीवन का रहे
इस सोच में जीने लगी हूँ
संभाव्य को दे आत्मा............

अंतस्तल झाँक देखा
हर सदन खाली मिला
एक कोने में मगर
हल्का उजाला भी मिला
रख दी थी पतवार मैंनें
राह दो तो फिर उठाऊँ
एक सरल विश्वास दो तो
नव सवेरा झिलमिलाऊँ
अर्थ जीवन का रहे .................
संभाव्य को दे आत्मा .............

थे कदम जिसपर धरे
राह उससे थी परे
कल्पना है तुझमे बेहतर
सोच दो तो पग बढ़ाऊँ
बस यही मन में प्रबल
एक प्यास का दीपक लिए हूँ
प्रेरणा बन कर किसी को
दीप्त दीपक मैं थमाऊँ
अर्थ जीवन का रहे ................
संभाव्य को दे आत्मा .............
.......आदर्शिनी.........२३/२/०१३

Saturday, February 2, 2013

सासू माँ

अभी कुछ समय पहले ही तो मुलाकात हुई थी l लगभग सवा वर्ष पहले दस दिन मेरे पास रहकर गईं थी वो l उनकी पोती का ब्याह जो था l किन्तु आज आभास होने लगा है कि एक महापुराण पर धूल जमने लगी है. जिसकी परत लाख पोछने पर भी मोटी होती जायेगी l जिसने अब तक थोडा भी उस पुराण का अध्ययन कर लिया या थोडा भी समझ लिया तो वह अवश्य ही अपने मनोभाव से इस भवसागर को पार कर जायेगा l उस पुराण के अमृत वचन, उसकी छाँव, उसका ज्ञान, उसका निर्देश, दूरदर्शिता, समस्याओं का निवारण, तपती देह पर शबनमी फुहार है, उस ग्रंथ का सानिध्य कंटकाकीर्ण पथ को रानीखेत का सुन्दर बाग करने में समर्थ है.

आज उनकी नज़र में मैं उनकी बहू नहीं बल्कि किसी परिचित इंजीनियर के घर में ब्याही गई कन्या थी फिर भी चरण स्पर्श के समय उनकी स्नेह पूरित डबडबाई आँखें, आशीर्वचन और पूरा खुला करतल सर पर महसूस कर इस रामायण से लिपटने को छटपटा गया l उनका कभी जागृत तो कभी सुप्त होता स्मरण बूढ़े को बच्चा, छोटे बच्चे को पिता और शादी के घर को सौरी का घर बना रहा था . सजी संवरी नई नवेली पौत्र वधू उन्हें सद्यः प्रसूता माँ लग रही थी, कभी औषधि तो कभी अन्न त्याग का हठ, चालीस पचास वर्ष पुराने दिवंगत स्वजनों को स्मरण कर विलाप, वर्षों पहले स्वीकार कर चुकी अपने वैधव्य के बावजूद अपने प्राणनाथ कि प्रतीक्षा...., वो और कोई नहीं मेरी सासू माँ हैं, उनकी एक-एक क्रिया उनके प्रति कभी माँ जैसा ममत्व जगा देती और उन्हें दुलारने का मन करता और कभी उनकी ओर सबकी विवशता पर मन सिहर जाता और आँखें द्रवित हो जातीं l

अपने बचपन से जवानी तक के सफर में अपना मायका अपनी माँ याद आने लगीं, याद आने लगी उनकी स्नेहपूर्ण फटकार, गोदी का झूला, आँगन में बिछी खाट पर अनमोल लोरियाँ, हर बच्चे के लिए रातों रात जगती आँखें, कभी मनगढंत तो कभी इतिहास और अध्यात्म को खंघालती सदराह दिखाती सशक्त करती कहानियां, ऐसी होती है एक माँ और एक महिला.

वो महापुराण तो चिरंजीवी है......., कोई संशय नहीं... फिर भी ......, फिर भी निरंतर समय कि गर्द झाड़ते, प्यार, दुलार, श्रद्धा, सम्मान, संरक्षण देते उसे और अधिक दिन बहुत दिन सुरक्षित रखा जा सकता है l अपना साया बहुत दिन बनाए  रखना हम सब पर 
माँ l ...............आदर्शिनी...........२/२/०१३

Wednesday, January 16, 2013

                                           अंजना (कहानी)

आज अंजना की आँखों से आंसूंरुक नहीं रहे थे. दिल जैसे फटा पड़ रहा था. चीखना चाह रही थी लेकिन घुट रही थी, आँखों में मजबूरी भी थी याचना भी, कि प्ल्ज़ मेरे दर्द को समझो. विवशतावश लिए गए पैसे, और अब उस पैसे भी महरूम मैं अपने वायदे से मजबूर हूँ. काश वो रूपये होते तो उसे वापस कर अपने जिगर के टुकड़े जिसे नौ माह अपने उदर में रख खून से सींचा उसे अन्य को कभी न देती. अपने उदर में उन शुक्राणुओं के प्रतिस्थापन के साथ ही मां बन्ने का विचार हिलोरे लेने लगा था. दिन बीतते-बीतते जी मिचलाना,धीमी लात तो कभी सर का एहसास, भारी होता पाँव,बेडौल होता शरीर,पेट और कमर का दर्द, अपने ही आकार को दर्पण में देख मुस्कुराना और अनायास ही पेट पर हाथ चला जाना फिर वो प्रसव की असहनीय पीड़ा? पूरे के पूरे शरीर में मातृत्व का एहसास. अनजान शहर में अनजान लोगों से विभिन्न परामर्श, जो उसकी हकीक़त से अनजान थे. कोई तेज चलने को मन करता तो कोई उसे गरी मिसरी खाने की सलाह देता. कोई कोई छेड़ता अरे ..अभी जो मन चाहे खा लो वर्ना बच्चा लार टपकायेगा और अंजना उस समय किये हुए सौदे को भूल जाती.

               अंजना अकेले में खुद को उस बच्चे से बिछोह के लिए तैयार करती और दूसरी ओर मातृत्व मोह में बंधती भी जाती. स्वीकृति देने से पूर्व अंजना इस उहापोह से अनजान थी. उसे नहीं पता था ममता की डोर क्या होती है? वह सिर्फ किताबों में मां की महिमा का बखान पढ़, मां के महत्त्व को समझती थी. कहते हैं रिश्तों को समझने के लिए रिश्तों का होना जरूरी है उसे ये बात अब समझ में आ रही थी. वह ये भी महसूस कर रही थी कि जोड़े कि दो बूँद का अंशांश उसके किलो-किलो रक्त पर भारी पड़ गया, वो तरस रही थी बच्चे को सीने से लगाने के लिए. पंद्रह दिन से बच्ची उसके साथ थी. शहद, पानी, गोरस से पेट भरने के बाद भी वो रोटी रही थी किन्तु एक दिन बाद डॉ की सलाह से अंजना के वक्ष से लग उसे जो तृप्ति हुई थी फिर तो नन्ही कली कितने घंटे सोती रही थी और अंजना अपलक नेत्रों से उसे निहार निहाल हुई जा रही थी. जैसी गोरी निश्छल अंजना वैसा ही गोरा निश्छल उसका प्रतिबिम्ब. वो तरस रही थी उन सब बाल क्रीडाओं के लिए जो उसने अन्य नन्हे-मुन्हों में अनुभव किये थे. बिस्तर गीला करना घुटनों-घुटनों चलना, सामानों की उठा पटक, तुतलाती बोली, पानी के स्तान पर मम्म: मम्म: कह पीछे लगाना, रात भर मां को जगा फिर दिन भर खुद चैन से सोना. आज ये सब सुख अनायास ही चिरंश की झोली में चले गए थे. किन्तु हाय! अब किये किये गए वादे  से विश्वासघात अंजना के लिए संभव न था.

           दूसरी ओर मृदु कि भी तरसती आँखों में मातृत्व हिंडोले ले रहा था. उसने गर्भ को महसूस भले न किया हो लेकिन एक-एक दिन कर इस शुभ दिन कि प्रतीक्षा अवश्य कि थी और स्वस्थ बच्चे कि अभिलाषा में उसने उस नियोग माँ (सेरोगेट मदर) को स्वस्थ रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी, मृदु और चित्रांश डॉक्टर के द्वारा अंजना का हाल-चाल लेते रहते और जबरदस्ती उसकी जरूरत का सामान उसे पहुंचाते रहते. मृदु इस शुभ दिन कि प्रतीक्षा में कभी मोज़े बिनती,कभी स्वेटर,तो कभी मुलायम सूती कपडे कि लंगोटी बनाने लग जाती तब चित्रांश इस उतावलेपन को देख उसे छेड़ता, आलिंगन में लेता और मुस्कुराता खुश होता. आखिर वो भी पिता के पद पर प्रतिष्ठित होने वाला जो था .

            अंजना के पास तो नई-नई अनुभूतियाँ थीं किन्तु मृदु...? उसे तो बस इंतज़ार ही करना था. निष्क्रीय खाली बैठ कल्पनाओं के महल संजोती रहती. ...व्यस्तता में घंटों छूमंतर हो जाते हैं किन्तु खाली पण में इंतज़ार कष्टकारी होता है .

       अंजना उन दंपत्ति कि आभारी थी कि उनके बढे धन के सहयोग से उसके गरीब घर के भविष्य के लिए सहारा मिल गया था और उसकी न होकर भी उसकी बच्ची एक संपन्न,शिक्षित और सदाचारी घर में जा रही थी
जिसे  भविष्य में,आपने खून पर गर्व करने कि पूरी सम्भावना थी . मृदु और चित्रांश ने इन दिनों उसे लगातार संपर्क में रखा था और अपरिचित या प्रथम प्रसव के भय को मक्ह्सूस नहीं होने दिया था फिर भी आज अंजना का मन मृदु के प्रति मृदुलता का अनुभव नहीं कर पा रहा था .वो ये भी जानती थी कि इस विपरीत भावना कि वो अधिकारी नहीं क्योंकि जो हुआ वो उसकी स्वीकृति से हुआ और आपने परिवार के सुखद भविष्य के लिए किया गया .

आज अंजना को वो तमाम घटनाएं जो टी.वी. पर देखती रही थी और अब तक भूल चुकी थी याद आने लगी थी. उसने उन तमाम औरतों कि व्यथाकथा सुनी थी जो सेरोगेट मदर बनने के लिए जबरदस्ती ढकेली जातीं हैं और उनकी शारीरिक पुष्टि को अनदेखा कर उस औरत को धन उपार्जन का साधन मात्र बनाया जाता है . कितने ही लालची पति अपनी पत्नी कि भावनाओं को ताख पर रख कोख का सौदा करते हैं और साथ ही उन्हें कलंकिनी भी कहते हैं .पुरुष का ये अपना ही व्यक्तित्व होता है औरत के त्याग और समर्पण को इतना उपेक्षित करो कि वो अपनी महत्ता ही भूल जाए. कितनी ही अपहृत कन्यायें बच्ची से औरत बन नियोग माँ का काम जबरन करतीं हैं .
    फिर भी अंजना इन सब से अपने को सौभाग्यशाली मान रही थी .उस पर कोई दबाव नहीं था, दबाव था तो बस जिम्मेदारियों का . यह त्याग उसने पूरे होशोहवास में किया था. एक बड़े परिवार को सम्भालने हेतु उसने स्वंय डॉक्टर से संपर्क किया था और अपना परिचय गुप्त रखने का अनुरोध भी. आज के लिए वह अपने को मानसिक तौर पर तैयार कर रही थी फिर भी उसकी जो मनोदशा थी उससे देवकी और अन्य अभागी माँओं से तुलना कर अपने को शान्त रखने का प्रयास कर रही थी कम से कम कंस जैसा वहशी हाथ तो नहीं था जो देवकी के समक्ष ही सद्य: जात: शिशु को चट्टान पर पटक लहुलुहान कर दे और देवकी प्रतिदिन दीवार पर पड़े रक्त बिंदु को लाल से कत्थई होता देखती रहे. पिछड़े  प्रदेशों में अनेकानेक घटनाएं ऐसी होती है जिसमे शिशुओं को अन्धविश्वास कि बलिवेदी पर चढाते हैं और कुछ कायर कन्या भ्रूण का पता लगते ही उसकी गर्भ में ही हत्या करा देतें हैं. पुरुष के चक्रव्यूह में घिरी इस पुरुषप्रधान समाज में एक लड़की कितना और कितना सहतीं हैं

       धीरे-धीरे अंजना को अपने पर और उस युगल दम्पत्ति पर गर्व होने लगा था . जिसने एक बेटी को  ममता कि छाँव दी थी और उस पर बेटा या बेटी होने कि शर्त भी नहीं रखी थी . अब अंजना को कोई पश्चाताप नहीं था बल्कि उसे गर्व था कि उसके कारण किसी के घर कि बगिया लहलहाई है वरना ममता के बदले इन रुपयों का क्या मोल ? समय में करवट बदली नहीं  कि ऐसे जाने कितने लाख चंद सिक्के बन जायेंगे. लेकिन मृदु और चित्रांश कि सूखी बगिया बिना उसके त्याग के हरी-भरी होना संभव नहीं थी. उसे गर्व था जिस प्रकार भगवान भास्कर ने अपने तेज से कुंती को मोहित कर और योगशक्ति से उसके भीतर प्रवेश कर गर्भ स्थापित किया और उसके कन्यात्व को दूषित नहीं किया उसी प्रकार उसे वासना छूई भी नहीं और वह माँ कि गौरव अनुभूति से परिचित हुई वो प्रसवावस्था के नौ माह और उससे जन्मी पन्द्रह दिन कि कन्या के सानिद्ध्य कि स्मृति में पूरा जीवन गुजार सकती है .
         
तुम धन्य हो अंजना ..............II

..........ADARSHINI.........16/01/2013    















 
                                      

Monday, January 14, 2013

कुछ तो करना होगा




 
      समाज में नैतिक पतन चरम पर है. सुशील शर्मा द्वारा तंदूर में पत्नी को झोंकना ,पिता द्वारा बाथटब में बेटी कि हत्या, बाप जीजा चचेरे रिश्तों द्वारा घर में असुरक्षित बेटियां, हत्याकर पेट चीर और अधिक विनाश के लिए टाइम बम फिट करना, सर कलम करना लाश को विकृत करना , एक तरफ कारवाही दूसरी तरफ रोज़ ही दुराचार कि घटनाओं से पटा पड़ा अखबार, वीभत्सता इतनी कि आंते तक बाहर खींच लेना क्या किसी भी तरह से ये कृत्य मानवीय गुणों के करीब है? या हमारा इतिहास हमें ही फिर से राक्षस या पशु कि श्रेणी में गिनेगा ?
     जो हमारा वर्तमान है वही कल भविष्य था हमने कभी अपने बच्चों के लिए ये नहीं सोचा था कि हमें भविष्य में ऐसे समाज के दर्शन होंगे, गर्त में जाती हुई नैतिकता और तमाम घटनाओं कि वीभत्सता कल्पना से भी परे है, विकृत हुए मन और दिमाग कि सुधार कि आशा दोबारा नहीं कि जा सकती, क्योंकि दुराचारी मन एक ऐसा दलदल है जिसके पंक से यदि स्वंय को बचा कर न रखा गया तो मनुष्य उसमे धँसता ही जाता है, हाँ इस मनो विकृति कि शुरुआत न हो ऐसा प्रयास जरूर किया जा सकता है,
      तमाम संचार माध्यम, इंटरनेट, आपत्तिजनक वेबसाईटस, बच्चों का कम उम्र में ही परिवार और माता-पिता से दूर बाहर जाकर पढ़ना और काम करना उन्हें मार्ग से अधिक भटकने के अवसर देता है, आधुनिक और आर्थिक युग में ये स्थितियां तो आनी ही हैं और बढ़ती भी जानी हैं, लड़का हो या लड़की अब दोनों ही महत्वाकांक्षी और उच्चाकांक्षी हैं और उन्हें समाज में निकलना ही है कोई भी शिक्षित और समझदार माता-पिता अब अपनी कन्या के लिए भी वही स्वप्न देखते है जो पुत्र के लिए, जिनका सब अच्छा-अच्छा हो गया तो समझो उन्होंने गंगा नहा लिया, किन्तु..., तो अब क्यों न जब तक बच्चे परिवार के सानिध्य में है उन्हें सही संस्कार के साथ कल आने वाले और घृणित युग से टकराने के लिए सक्षम बनाएँ, क्यों न बेटियों को गुडिया गुड्डा के साथ कार, बन्दूक, यंग इंजीनियर, मोनोपोली, रुबिक्स क्यूब, जैसे बौद्धिक क्षमता को बढ़ाने वाले खिलौने भी दें, क्यों न उन्हें किताबी ज्ञान के साथ जुडो कराटे तैराकी के भी गुण सिखाएँ, क्यों हम लड़कों कि अपेक्षा उन्हें ही त्याग, बलिदान, समर्पण, समायोजन और बर्दाश्त का पाठ अधिक पढाएं, जबकि ये दोनों ही लिंगों के लिय सामान हितकारी है. एक सिगरेट पीती लड़की कि फोटो पर बहुत उपेक्षनीय टिप्पणियाँ आती है तो क्या पुरुषों के लिए ये गर्व का विषय माना  जाना चाहिए? बुराई दोनों के लिए बुराई है. हमारा एक के लिए छूट और स्वीकार्य और दूसरी ओर उपेक्षा और बंधन कैसे सही है? दो संतानों के प्रति ये कैसा विभेद? शायद यही महिला पुरुष के मध्य बढ़ती खाईयों का कारण है, ध्यान रखे अब वो समय आ गया है कि जैसा परिवेश, जैसा खेल, जैसी सीख दे वो बेटा बेटी कि बराबर हो. जिससे दोनों ही एक दूसरे के मानवीय गुणों को आत्मसात कर, समानता के अधिकार के सृजित समाज में सम्मानित जीवन व्यतीत कर सकें, वरना शराबी पति आपकी बेटी को कौड़ी कौड़ी मोहताज कर भी देवत्व पद पर आसीन रहेगा, और लालची पति रोज़ लात घूँसों से प्रताड़ित कर माएके से धन कि माँग करवाएगा और चुप रहने पर जीते ही अग्नि दहन होगा, आपकी बेटी आपने अनाधिकारी परिजनों से नोची जायेगी और सहनशील कहलाएगी , आपकी बेटी का पति उसी के सामने दूसरी सेज सजायेगा और वो मर्यादित रहेगी, राम सिंह फिर किसकी बेटी का चयन करेगा कहा नहीं जा सकता, ध्यान दे ये किसी महिला को बिगाड़ने कि बात नहीं है और न किसी सीमा का उलंघन, आप शिक्षित ही है जो ये लेख पढ़ रहें है, ये आपकी नवजात, एक वर्ष, चार वर्ष, आठ वर्ष जैसी नन्ही कली कि सुरक्षा और अधिकार कि बात है, अब अगर उसे घर कि चार दीवारी में कैद कर, देवी बना, संस्कार थोप, अनावश्यक नारी का महिमामंडन कर बंधनों में बाँध मानसिक औए शारीरिक रूप से कमजोर किया तो उस पर हुए अत्याचार और बलात्कार के दोषी हम खुद ही होंगें, उसके निर्णय, आवश्यकता, सुख, इच्छओं, स्वास्थ्य, को शिक्षा को खुलकर महत्व दें, 

             घर कि महिलाओं को परिवार में ऊँचा स्थान, मान-सम्मान. और महत्त्व दें, व्यवहार, अत्यधिक अपेक्षाएं छोड़ मानसिकता बदलें, घर का बासी भोजन खुशी से मिलकर खाएं, ऐसा कदापि संभव नहीं कि आप अपनी बेटी कि सुभविष्य कल्पना कर उपरोक्त तथ्य का समर्थन तो कर रहे और घर कि महिलाओं कि ओर से नजरिया वही है .
आदर्शिनी श्रीवास्तव ”दर्शी”
14/1/2013, meerut
                                   
                                

Sunday, December 30, 2012


                                        प्रदूषण तांडव  
सर्वविदित है की दूषित पर्यावरण का प्रभाव हमारी शारीरिक और मानसिक विकास को अत्यंत क्षति पहुंचा रहा हैI
ये हमारे इसी जीवन को प्रभावित नहीं कर रहा बल्कि, यदि इसको बल पूर्वक रोका न गया तो इसके दुष्प्रभाव से आने वाली अनेक पीढ़ियाँ भी प्रभावित होंगीं आजकल के इस अर्थयुगीन और आराम पसंद युग में सुविधाओं का त्वरित लाभ उठा भविष्य की आशंकाओं को लोग अनदेखा कर रहे हैं प्लास्टिक, औद्योगिक उपकरण, कर्णविदीर्ण संगीत, गाड़ियों का कोलाहल, विषैली गैसें, ख़ुशी के इज़हार हेतु बार-बार प्रयोग होते पटाखे ओजोन परत को नुक्सान पहुंचा वायु मंडल कि शुद्धता का भक्षण कर रहे हैं I
 प्लास्टिक की थैलियों पर तो सरकार लगाम लगाने का प्रयास करती दिख रही है किन्ही-किन्ही शहरों और प्रदेशों में पोलिथिन पर प्रतिबन्ध लगाया भी गया है किन्तु ढील मिलते ही फिर इसका प्रयोग धडल्ले से शुरू हो जाता है  कभी कभी तो सरकार की मंशा पर भी संदेह होता है कि सिर्फ पोलीथिन पर प्रतिबन्ध लगाने से क्या होगा यदि अन्य यूज़ एंड थ्रो सामग्रियां यूँ ही उपयोग होती रहीं, भोजन की पैक थालियाँ, किसी भी जलसे में थर्मोकोल, प्लास्टिक के गिलास, चम्मच, प्लेट, पानी की बोतल के प्रयोग देखे जा रहें हैं. क्या इसका उत्पादन न हो इसपर ध्यान देने की जरूरत सरकार नहीं समझ रही ? या इसका उपयोग न हो इस पर अलग से कानून बनेगा? इसको जलाने से वायु में कार्बन जैसे हानिकारक गैस का मिश्रण होगा. यदि भूमि में दबाया गया तो पृथ्वी की ऑक्सीजन को बाधित कर जमीन बंजर करेगा और यदि यूँ ही पड़ा रहा तो गंदगी, बीमारी और असभ्यता को न्योता देगा और वर्षाकाल में पानी में मिल नदियों के जल प्रवाह को बाधित और जल प्रदूषण को पैदा करेगा
भारत की ऊंचाई पर स्थिति श्रीनगर जैसे मनमोहक शहर में कृष्णा ढाबा में भोजन करने का दुर्भाग्य प्राप्त हुआ जिसमे इतनी अधिक संख्या में ग्राहक आते है की उपभोक्ता को खाने की थाली के लिए घंटों घंटो इंतजार करना पड़ता है और मई जून में हजारों की तादात में लोग प्रतिदिन भोजन ग्रहण करते है किन्तु वहां इसी थर्मोकोल और प्लास्टिक के डिस्पोजेबल क्रोकरी का ही उपयोग होता है ये देख कर मन काँप गया भोजन से जी उचाट हो गया जब इस और ध्यान गया की आखिर दोपहर और रात का इतना कचड़ा कहाँ जाता होगा पहाड़ी जल प्रपातो ,नदियों में बह वो मैदानी भागों को गन्दला करता जा रहा होगा. पत्थरों के मध्य फंस कितनी नदियों का मार्ग अवरुद्ध कर रहा होगा. दिशा भ्रमित हुई नदियाँ पूरे-पूरे गाँव को निगल लेने की ताक में होंगीं ये जल प्रदूषण क्या प्रलय का सीधा साधा निमंत्रण न होगा ?
जल में निहित होते जा रहे तमाम अवांछनीय कारक और पदार्थ मुख्यतः क्लोराइड सोडियम, बाई कार्बोनेट, मैग्नीशियम, पोटेशियम, अमोनिया कार्बन मोनोऑक्साइड और औद्योगिक अवशिष्ट जल को प्रभवित करते जा रहे हैं और वायु, जल, ध्वनि, मृदा, नाभिकी सभी प्रदुषण वातावरणीय जल के साथ मिल अम्लीय वर्षा कर मानव जीवन को प्रभावित कर रहे हैं.
कोशिश करें पोलीथिन के स्थान पर कपडे या कागज के झोले का इस्तेमाल करें, अनावश्यक सामानों का क्रय न करें, पटाखों के प्रयोग से बचें, प्लास्टिक त्याग कांच या धातुओं के बर्तन का उपयोग करें, मोबाइल कंप्यूटर का उपयोग जरूरत के लिए करें, गाड़ियों का कम प्रयोग करें, धर्म के नाम पर नदियों में अघुलनशील पदार्थों को प्रवाहित न करें, प्रकृति जीवन दायिनी है इन छोटे छोटे योगदान से हम प्रकृति के ऋण से कुछ तो उबर ही सकते हैं              
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