Sunday, February 24, 2013

प्रतिबिम्ब

आज पर अतीत का
प्रतिबिम्ब ही हूँ लख रही
संभाव्य को दे आत्मा
मैं आज कल जीने लगी हूँ
उलझी हुई एक डोर थी
सुलझी न मुझसे अब तलक
तन पर गिरा एक जाल है
जिससे अभी निकली नहीं हूँ
अर्थ जीवन का रहे
इस सोच में जीने लगी हूँ
संभाव्य को दे आत्मा............

अंतस्तल झाँक देखा
हर सदन खाली मिला
एक कोने में मगर
हल्का उजाला भी मिला
रख दी थी पतवार मैंनें
राह दो तो फिर उठाऊँ
एक सरल विश्वास दो तो
नव सवेरा झिलमिलाऊँ
अर्थ जीवन का रहे .................
संभाव्य को दे आत्मा .............

थे कदम जिसपर धरे
राह उससे थी परे
कल्पना है तुझमे बेहतर
सोच दो तो पग बढ़ाऊँ
बस यही मन में प्रबल
एक प्यास का दीपक लिए हूँ
प्रेरणा बन कर किसी को
दीप्त दीपक मैं थमाऊँ
अर्थ जीवन का रहे ................
संभाव्य को दे आत्मा .............
.......आदर्शिनी.........२३/२/०१३

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