Wednesday, December 28, 2011

सबने समझा मै काठ रची

जीवन जैसे युग बीता
दिन-दिन जीवन सा लम्ब हुआ
कठपुतली सी इठलाई गई
डोरी में अंतरद्वंद्व हुआ
ऊँगली कि थिरकन पर थिरकी
ऊँगली ठिठकी काठी ठिठकी
समझा ना कोई उर कि पीड़ा
जल-जल कर कैसा रंग हुआ
सबने समझा मै काठ रची
लोगो का तो आनंद हुआ
मेरे कोरों से नीर बहे
मन उमड़-उमड़ के छंद हुआ
इंद्र धनुषी जो कुछ भी था
शनैः-शनैः वो धवल हुआ
डाली का महका सुमन-सुमन
मुरझा मुरझा बदरंग हुआ

कोहरा

हिम सा प्रसरित है रजत कोहरा
गगन धरा सब श्वेत हुई
पाती-पाती सच्चे मोती को
पाकर् के अभिभूत हुई
विधु कि किरणों से लिपटी उतरी
कुछ पल को खामोश रही
रवि किरण के साथ जा उडी
फिर से नभ में विलीन हुई

Sunday, December 11, 2011

नव वर्ष बधाई -----२०१२

खटमिट्ठी यादों कि ओढ़ चदरिया,
गतवर्ष कहे मै चला बजरिया,
घर-घर बन्दनवार सजाओ,
नववर्ष लगे मानो नई दुल्हनिया,
आँगन-आँगन में साज सजाओ,
साल भर बजती रहे ढूलकिया,
गीत हर्ष के गूँजे घर-घर
छमछम नाचे नर नागरिया

भजन

हे ईश्वर मै जिधर देखूँ,
काशी उस ओर नज़र आए ,
एक पाँव धरूं जिस ओर प्रभु,
वृन्दावन और निकट आए,
हाथ उठे किसी कर्म को जब,
तेरे चरणों को छू जाए,
धडकन-धडकन तू हर साँस-साँस,
बोलूं तो राम निकल जाए,
पसरी ध्वनियों में कर्ण धरूं
श्रवण तेरे नाम का हो जाए,
हे ईश्वर मै जिधर देखूँ
काशी उस ओर नज़र आए

तुम ज़हन में अभी भी रहते हो

तुम ज़हन में अभी भी रहते हो,
तुमको खुद छोड़ कर मै आई थी,

याद आता है तेरा गीत बहुत
जिसे तुम संग मै गुनगुनाई थी,

ज़मी का बिस्तर औ चाँदनी चादर
रात भी देख मुस्कुराई थी,

छूकर प्याली जो तेरे पास गई
तूने भी होठ से लगाईं थी

सामने फिर से देखकर तुमको
दिल में धड़कन कहाँ समाई थी,

दूर जाने कि चाह थी फिर भी
दिल तेरे पास छोड़ आई थी,

Tuesday, November 29, 2011

..खामोश हैं क्यूँ दिल कि गिरह कुछ तो खोलिए,.........

खामोश हैं क्यूँ दिल कि गिरह कुछ तो खोलिए,
इस बेरूखी कि वजह बताइए हुज़ूर,
नज़र में कोई और है तो वो भी बोलिए,
खामोश हैं क्यूँ दिल कि गिरह कुछ तो खोलिए,

किसी का हाथ था निभाना भी है दस्तूर,
अरसे बंद क्यूँ है जुबां ये तो बोलिए,
खामोश हैं क्यूँ दिल कि गिरह कुछ तो खोलिए,

मशरूफ हैं कहीं या है मेरा ही कुसूर,
करना अगर किनारा है तो ये भी बोलिए,
खामोश हैं क्यूँ दिल कि गिरह कुछ तो खोलिए,

किसी कि मोहब्बत ने क्या ला दिया गुरूर
इस ओर गौर कीजिये फिर दिल से तोलिये,
खामोश हैं क्यूँ दिल कि गिरह कुछ तो खोलिए,

समझ गई कि 'आदर्शिनी' कि फ़िक्र है फ़िज़ूल,
आज़मा अगर रहे हैं तो आज़मा के बोलिए,
खामोश हैं क्यूँ दिल कि गिरह कुछ तो खोलिए,

Monday, November 28, 2011

.........ईश वंदना .........

हे विघ्न विनाशक ईश मेरे,
मुझको एक दृष्टि नवल दे दो,
सर्वप्रथम आराधन हो तेरा,
निर्विघ्न कार्य हो वर दे दो,

हे मात शारदा नमन तुम्हें,
करूँ भक्ति अमित ये वर दे दो,
स्वर झंकृत हो मेरे मन का,
शब्द मचल पड़े ये वर दे दो,

माँ लक्ष्मी रूप अनूप तेरा,
वैभव हो अपार सुमति दे दो,
प्रणिपात करूँ मै चरण तेरे,
मन निश्छल, ज्ञान मुझे दे दो,

हे रूद्र,ब्रह्म,विष्णु मेरे,
उत्साह पूर्ण तन-मन दे दो,
आशीष सदैव रहा तेरा,
इस योग्य रहूँ ये वर दे दो,

हे सृष्टि रचयिता ब्रह्मणिप्रिय,
हे चक्र गदाधर लक्ष्मीप्रिय,
हे चन्द्रमौलिशिव गौरिप्रिये,
हे धनुधर राम जानकीप्रिय.
हे मुरलीधर तुम राधेप्रिय,
हे अम्बे माँ तू भक्ति प्रिय,
हे सरस्वती माँ तुम इष्ट मेरी,
करती हूँ प्रणाम सब ईश कि जय,