Thursday, November 10, 2011

मिलने का अगर कुछ इरादा लगे,

तेरा मन जब तुझसे खफा सा लगे,
टूटा-टूटा सा कुछ बेवफा सा लगे,
मेरी याद सनम तुम कर लेना,
मिलने का अगर कुछ इरादा लगे,

कभी नेह बदरी में भीगा था तन-मन,
अधर-पंखुडी मुस्कुराई थी तुम संग,
अब तेरे बिना बेसहारा लगे,
चले हो किधर कुछ बुरा सा लगे,
मेरी याद सनम तुम कर लेना मिलने का ...........................

कर भरोसा तुम्हारी रहूंगी सदा,
भूलो तुम मुझे मैं न भूलू ज़रा,
रुंधा सा गला जब तुम्हारा लगे,
विकल सा हृदय जब तुम्हारा लगे,
मेरी याद सनम तुम कर लेना मिलने का ...........................

कोने कोने में अंकित है नाम तेरा,
छिपकर रखा दिल में प्यार तेरा,
परेशां अगर मन ज़रा सा लगे,
पलकों पे अगर भीगा भीगा लगे,
मेरी याद सनम तुम कर लेना मिलने का ...........................

Wednesday, November 9, 2011

हृदय अगर यूँ मोम न होता

हृदय अगर यूँ मोम न होता,

हृदय अगर प्रस्तर का होता,
तो कोई आघात न होता,
अहर्निश के मानस-मंथन से,
मन यूँ सिसक सिसक न रोता, हृदय यदि कसकभरा न होता,
हृदय अगर यूँ मोम न होता,



धक-धक कि हर गूँज से आतुर,
प्रतीक्षित आहट आभास न होता,
श्वास-श्वास उठने-गिरने से,
मिलन-भय का संकोच न होता, हृदय यदि कवि का न होता,
हृदय अगर यूँ मोम न होता,

आता-जाता जीवन में कोई,
गहरा मगर लगाव न होता,
चित्त-वेदना पूर्ण भाव का,
दृग द्वार से पार न होता , हृदय पट पर यदि भाव न होता,
हृदय अगर यूँ मोम न होता,


औरों सा ही दे प्रत्युत्तर ,
मन पर कोई क्लेश न होता,
रूप बिम्ब अपने साजन का ,
निशि-वासर प्रत्यक्ष न होता,हृदय यदि दर्पण न होता,
हृदय अगर यूँ मोम न होता,

Saturday, November 5, 2011

..........क्यूँ भरते हो इतना दर्द............

क्यूँ रोते हो जीवन का रोना, क्यूँ भरते हो इतना दर्द,
दुःख के निर्मल सागर में सीपी और सजा करते,

गीत लिखो जो हंसी बिखेरे
टीस परे हट जाने दो,
मिले जो आगे दुलार उसे लो,
रो रो नहीं जिया करते ,

कुछ ही समय बही थी नदियाँ अश्रु नयन के सूख गए,
गीली-गीली आँखे रख कर जीवन नहीं जिया करते,

कई बार बिखरी थी कड़ियाँ,
फिर जोड़ा है तुमने ही,
जीवनपथ पर हार न मानो,
यूँ ही लोग बढा करते,

बिखरना हो मोती बिखराओ, अपने से टूटे रस्तो पर,
प्रेमिल वही जो बिखरा मुस्काने मोती नहीं गिना करते,

तुमने उतना दिया नहीं,
जितना संतोष मिला है तुम्हे,
दुःख ले मिसरी देने वाले,
सुख को नहीं छिपा सकते,
तुम हो आज जहाँ पर स्थित कल कोई और रुका होगा,
कलेवर बदला करते हैं, पर मानव वही रहा करते,

Tuesday, November 1, 2011

...........पगतल से कण-कण सरकती हुई जमी को ..........

धरती को आकाश संग झूलते हुए देखा
हाथों में हाथ डाले टहलते हुए देखा
पगतल से कण-कण सरकती हुई जमी को,
लहरों को दौड दौड कर खेलते हुए देखा,

सीधी कभी गोलाई में उछलती हुई लहरें
दौड़ती हुई कभी तो थकी थकी सी भी लहरे,
सांप सा फन काड़े विष टपकाती सी लहरे
सागर में गोल-गोल घूम समाती हुई लहरें

तमतमाती धूप में सधी-सी थीं जो लहरे
विधु की चमक देख जैसे बौरा गईं लहरे
लहर लहर को जब ज्योत्सना चूमने लगी
छूने को चाँद, बाँध तोड़, बहक गई लहरे,

जहाँ दिखे कोमल सा मन-मोहक सा सागर,
उन्मादी, कर्ण विदीर्ण करे कभी घोष भयंकर,
नीले तरल में जैसे फेनिल झाग का मिश्रण,
कभी दिखे प्रवाह में बहता लोगो का बवंडर,

श्वेत, कभी नीली, हरी कतार की रफ़्तार,
वृत्त कभी तो लगे कभी समतल सी चट्टान,
नीली घटाओं में लगे कभी रुई का फाहा,
शांत समुद्र करता कभी नाग सी फुफ्कार,

बहाव में इसके घर मकान उजड़ते हुए देखा,
हजारों सीप और मीन को उछलते हुए देखा,
ईश्वर का सौंदर्य कहूँ या विध्वंस की लीला,
कितने जलचरो को किनारों पे तडपते हुए देखा,

एक चिंतन और एहसास के साथ रची ये रचना

........शीतल तन,तपता मन ..........

निशि ठंड से बच धरती ने,
हिमकण की चादर तानी,
सच कहूँ तब क्या,
चांदनी थी चन्दा से अनजानी?
ठिठुर रही थी निशा
और वे बाँहों में बाहें डाले,
तिरछी दृष्टि थी सबकी उनपर,
पर वे भी थे मतवाले,
जल सीकर से भीगी थी वसुधा,
उनदोनों को होश नहीं था,
देख शीतल तन पर तपते मन को,
अम्बर भी कुछ हतप्रभ था,
लोगों की रातें थीं लम्बी,
उनदोनो की कितनी छोटी,
इंदु जहाँ-जहाँ जाता था,
इंदु किरण संग होती,
"पागल हैं दोनों" कह रवि ने
धीरे से आँखें खोली,
हल्की-हल्की गर्मी दे कर
उनपर भी बाहें फेरी,
हिम चादर वसु ने सरकाई,
विधु-अंशु ने होश सम्भाला,
वसुधा और प्रणयी दोनों को
मिल गया एक सुखद सहारा,
लुप्त हुए निशिचर नभ से
खग मृग ने ली अंगड़ाई,
शीश झुका चल दिए वे भी
महकी फूलो से अँगनाई,
इंदु,विधु =चाँद
अंशु=किरण
प्रणयी=प्रेमिल जोड़ा
वसु,वसुधा=धरती

Monday, October 31, 2011

........कहाँ रोज़ का मिलना और पहरों पहरों की बातें .........

अकस्मात झटके हाथों को,
संभव था न मैं सह पाती,
भला किया,जो तूने
धीरे-धीरे हाथ छुड़ाया,
कहाँ रोज़ का मिलना
और पहरों पहरों की बातें,
एक-एक कम कर दिन छूटे
पहरों से पहर थे जाते,
अंतराल बढ़ता दिन-दिन का,
पहर का क्षणिकों में ढलना,
आज दिवस वो आया,
तुझमे मेरा नहीं है कोई सपना,
अभ्यस्त हुई हूँ मुश्किल से,
अब आवाज़ न मुझको देना,
संयत हो जैसे तुम प्रिय,
मुझको भी होने देना,
लाए तुम सिंदूरी बिंदिया,
कभी लाए थे कजरा,
तेरे हाथो से हर दिन
कतरों-कतरों में सजना,
हौले से चुनरी सरका के
माथे तक रख देना,
प्रेम में मैं भीगी थी जैसे
ओस में भीगे रैना,
दो संबल भुला सकूँ मैं,
पर बहुत कठिन है कहना,
तोडूँ कैसे तेरे प्रेम का,
पहने था जो अबतक गहना

Friday, October 28, 2011

......मालूम नहीं उनको हम गुजरें हैं किधर से ........

आँखों में दर्द का सैलाब,होठ कुछ कहने को बेताब,
शायद मेरी ही तरह तुम्हे भी लगे ज़ख्म गहरे हैं,
खुद की तकलीफ बयां करने की आदत नहीं तुम्हे,
काँधे का दूँ सहारा इस पर भी तो लगे पहरे हैं,

कदम बढ़ रहे हैं मेरी ओर हम समझ रहे हैं,
फासला दरमियाँ रहे अनजान बन पीछे खिसक रहे हैं,
मिलने की ख्वाहिश है इस पर हमने बात टाल दी,
याद आ गए वो दर्द जो अबतक हमें तोड़ रहे हैं,

दिल मोहब्बत करने की फिर गलती ना कर जाये,
प्यार को ठुकराना भी तो आसान नहीं है,
क़ुबूल करूँ तोहफा जिद थी उनकी बहुत लेकिन,
कह दिया तुम में जो बात है दौलत में नहीं है,

मालूम नहीं उनको हम गुज़रे हैं किधर से,
कैसे कहूँ हदतक मोहब्बत कर चुकी हूँ मैं,
दिल लेना और देना कोई दिल्लगी नहीं है,
एकबार जिसका होना था उसकी हो चुकी हूँ मैं,